आंबेडकरवाद : प्रतीकवाद से मुक्ति और वैचारिक प्रतिबद्धता की कविता
‘आंबेडकरवादी कविता के प्रतिमान’ जैसे आलोचनात्मक ग्रंथ के लेखक तथा ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ पत्रिका के संपादक देवचंद्र भारती ‘प्रखर’ समकालीन हिंदी साहित्य के एक प्रतिबद्ध, क्रांतिकारी साहित्यकार एवं सजग समालोचक हैं। उनका साहित्य आंबेडकरवाद को भावनात्मक नारेबाज़ी से मुक्त कर वैचारिक, नैतिक और व्यवहारिक धरातल पर स्थापित करने का गंभीर प्रयास करता है। यहाँ प्रस्तुत कविता ‘आंबेडकरवाद’ में कवि ने आंबेडकरवाद की सम्यक और मौलिक परिभाषा प्रस्तुत की है। कविता उन प्रवृत्तियों की तीखी आलोचना करती है, जो आंबेडकरवाद को केवल जयंती-उत्सव, नारों, मंचीय भाषणों और प्रतीकात्मक आयोजनों तक सीमित कर देती हैं। साथ ही, यह रचना वर्तमान समय में आंबेडकरवाद को भ्रमित दिशा में ले जा रहे पाखंडपूर्ण, अवसरवादी और आत्मकेंद्रित तत्वों का वैचारिक प्रतिवाद भी है। देवचंद्र भारती ‘प्रखर’ के यहाँ आंबेडकरवाद कोई कर्मकांड नहीं, बल्कि विचार-परिवर्तन, व्यवहार-परिवर्तन और नैतिक प्रतिबद्धता की क्रांतिकारी प्रक्रिया है, जिसका अंतिम लक्ष्य समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व की सामाजिक स्थापना है। कविता पर संक्षिप्त आलोचनात्मक टिप्पणी यह...