संदेश

रचनात्मक लेखन लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आंबेडकरवाद : प्रतीकवाद से मुक्ति और वैचारिक प्रतिबद्धता की कविता

‘आंबेडकरवादी कविता के प्रतिमान’ जैसे आलोचनात्मक ग्रंथ के लेखक तथा ‘आंबेडकरवादी साहित्य’ पत्रिका के संपादक देवचंद्र भारती ‘प्रखर’ समकालीन हिंदी साहित्य के एक प्रतिबद्ध, क्रांतिकारी साहित्यकार एवं सजग समालोचक हैं। उनका साहित्य आंबेडकरवाद को भावनात्मक नारेबाज़ी से मुक्त कर वैचारिक, नैतिक और व्यवहारिक धरातल पर स्थापित करने का गंभीर प्रयास करता है। यहाँ प्रस्तुत कविता ‘आंबेडकरवाद’ में कवि ने आंबेडकरवाद की सम्यक और मौलिक परिभाषा प्रस्तुत की है। कविता उन प्रवृत्तियों की तीखी आलोचना करती है, जो आंबेडकरवाद को केवल जयंती-उत्सव, नारों, मंचीय भाषणों और प्रतीकात्मक आयोजनों तक सीमित कर देती हैं। साथ ही, यह रचना वर्तमान समय में आंबेडकरवाद को भ्रमित दिशा में ले जा रहे पाखंडपूर्ण, अवसरवादी और आत्मकेंद्रित तत्वों का वैचारिक प्रतिवाद भी है। देवचंद्र भारती ‘प्रखर’ के यहाँ आंबेडकरवाद कोई कर्मकांड नहीं, बल्कि विचार-परिवर्तन, व्यवहार-परिवर्तन और नैतिक प्रतिबद्धता की क्रांतिकारी प्रक्रिया है, जिसका अंतिम लक्ष्य समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व की सामाजिक स्थापना है। कविता पर संक्षिप्त आलोचनात्मक टिप्पणी यह...

नारीवाद की पों-पों (नारी-विमर्श की कविता)

नारी-मुक्ति का प्रश्न अत्यंत गंभीर और आवश्यक है, किंतु हर वह विमर्श जो स्वयं को 'नारीवाद' कहता है, समतावादी हो - यह आवश्यक नहीं। डॉ. भीमराव आंबेडकर का चिंतन स्त्री-मुक्ति को सामाजिक न्याय, समान अधिकार और मानवीय गरिमा के व्यापक संदर्भ में देखता है, न कि स्त्री बनाम पुरुष के संघर्ष के रूप में। यह कविता उसी बिंदु पर हस्तक्षेप करती है, जहाँ नारी-विमर्श, सामाजिक एकता की बजाय वैचारिक ध्रुवीकरण और लिंग-आधारित दूरी को बढ़ावा देने लगता है। यह रचना स्त्री-विरोध नहीं, बल्कि विभाजनकारी विचारधाराओं की आलोचना है और आंबेडकरवादी समतामूलक दृष्टि की पुनर्स्थापना का प्रयास है। 'नारीवाद की पों-पों' कविता 'विषमता के विरुद्ध' नामक पुस्तक में संग्रहीत है। यह कविता नारी-विमर्श से संबंधित है, किंतु इसमें 'नारीवाद' शब्द का विरोध किया गया है। नारीवाद की पों-पों (नारी-विमर्श की कविता) लिंगवाद की बातें  समतावाद नहीं है । आंबेडकरवाद का हिस्सा  नारीवाद नहीं है ।। आंबेडकरवादी चिंतन को  समझो और जानो । पहले सच्चे आंबेडकरवादी  को पहचानो ।। 📝 नारी-विमर्श पर आधारित देवचंद्र भारती 'प्रख...

कटु यथार्थ (पुरुष-विमर्श की कविता)

समकालीन विमर्श में सामाजिक विफलताओं का सारा बोझ अक्सर एक ही पक्ष पर डाल दिया जाता है। 'पुरुष-सुधार' की भाषा में कही जाने वाली अनेक बातें चयनात्मक यथार्थ पर आधारित होती हैं, जहाँ आत्मालोचना की जगह आरोप-प्रत्यारोप ले लेते हैं। यह कविता उसी एकांगी दृष्टि पर प्रश्न उठाती है।  'कटु यथार्थ' कविता 'विषमता के विरुद्ध' नामक पुस्तक में संग्रहीत है। यह कविता किसी वर्ग के प्रति घृणा नहीं, बल्कि रिश्तों, अपेक्षाओं और व्यवहार में मौजूद दोहरे मानदंडों की ओर संकेत है। यह रचना पाठक को असहज करती है, ताकि वह अपने-अपने पक्ष की जिम्मेदारियों पर भी विचार करें—क्योंकि सामाजिक सुधार एकतरफा नहीं, साझा प्रयास से ही संभव है। कटु यथार्थ  (नारी-विमर्श एवं पुरुष-विमर्श की कविता) हम पुरुषों को सुधारने में  ऊर्जा नहीं खपाओ । ऐ महिलाओं! कब सुधरोगी  पहले तुम बतलाओ ।। कटु यथार्थ है, हम पुरुषों ने  कुलटा को भी चाहा । मार-पीटकर भी उसके ही  संग जीवन को निबाहा ।। 📝 नारी-विमर्श पर आधारित देवचंद्र भारती 'प्रखर' की एक अन्य कविता 👉 'नारीवाद की पों-पों' को भी पढ़ें। पढ़ी-लिखी तुम सब महि...

दीपदान-उत्सव के नाम पर अंधभक्ति (आंबेडकरवादी कविता)

दीपदान, जिसे पारंपरिक रूप से एक धाम्मिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, प्रायः लोगों की अंधश्रद्धा और भ्रम का कारण बन जाता है। महायान की अनेक प्रथाओं में यह देखा गया है कि वास्तविक बुद्ध-धम्म के संदेश को भूलकर केवल अंधविश्वास और पाखंड का अनुपालन किया जाता है। इस ब्लॉग में प्रस्तुत आंबेडकरवादी कविता के माध्यम से कवि ने महायान की इस भ्रमपूर्ण उत्सव दीपदान की वास्तविकता को व्यक्त किया है। कवि के अनुसार, 'दीपदान' और 'दीपावली' में कोई अंतर नहीं दिखाई देता है।  दीपदान-उत्सव के नाम पर अंधभक्ति (आंबेडकरवादी कविता) महायान वाले हैं बातें बनाते। 'दीपदान' कहकर दीवाली मनाते।। शुद्ध धम्म बुद्ध का समझ ही न पाये। करके अशुद्ध धम्म को, खिलखिलाते।। नकली हैं, करते नकल दूसरों की। नाम अलग, काम एक जैसा दिखाते।। उनके ही जैसे ये भी पूजा करते। बुद्ध-मूर्ति को फल-मिठाई चढ़ाते।। बुद्ध-धम्म विज्ञान का अनुगमन है। ये अंधभक्ति में सब भूल जाते।। हीनयान को हीन हैं ये समझते। ये धम्म-राही को हैं भटकाते।। 'प्रखर' नक्कालों से रहना संभलकर। करके कुतर्क भीड़ हैं ये जमाते।। [ रचना तिथि : 19/10/2...

गुरु रविदास पचासा : समता, श्रम और मानव-गरिमा के संत कवि को काव्यात्मक श्रद्धांजलि

भारतीय संत परंपरा में गुरु रविदास एक ऐसे क्रांतिकारी संत कवि हैं, जिनकी वाणी भक्ति के साथ-साथ सामाजिक समानता और मानव-गरिमा की सशक्त घोषणा करती है। उन्होंने कर्म, श्रम और सदाचार को ही सच्चा धर्म मानते हुए जाति, कुल और ऊँच-नीच की संकीर्ण दीवारों को अस्वीकार किया। 'गुरु रविदास पचासा' उसी वैचारिक परंपरा का काव्यात्मक विस्तार है, जिसमें गुरु रविदास के जीवन-दर्शन, सामाजिक दृष्टि और मानवीय मूल्यों को पचास छंदों में रूपायित किया गया है। इसके साथ प्रस्तुत रविदास वंदना श्रद्धा का स्वर है, जबकि कीर्ति दशक गुरु रविदास की ऐतिहासिक और वैचारिक महत्ता को संक्षेप में रेखांकित करता है। यह रचना न केवल प्रशस्ति-काव्य है, बल्कि सामाजिक चेतना का भी सशक्त साहित्यिक दस्तावेज है।   गुरु रविदास-वंदना में  मानव छंद का प्रयोग किया गया है। गुरु रविदास पचासा में परंपरागत दोहा-चौपाई छंद है। गुरु रविदास वंदना  [मानव छंद में गुरु रविदास जी की स्तुति]   शांत करें मन का संत्रास। संत शिरोमणि गुरु रविदास।१। मन ही पूजा मन ही धूप। मन ही देखे सहज स्वरूप।। शीघ्र बनाते मन को दास। संत शिरोमणि गुरु रविद...

आंबेडकरवादी साहित्य (On YouTube)

'आंबेडकरवादी साहित्य'  (AMBEDKARVADI SAHITYA)  एक यूट्यूब चैनल है । इस चैनल को दर्शक Social Media की अन्य वेबसाइटों Facebook , Twitter , Instagram , Google Plus तथा Blogger पर भी फॉलो कर सकते हैं । 'आंबेडकरवादी साहित्य' चैनल का उद्देश्य अपने अर्थ व परिभाषा के अनुरूप ही है । इसके लिए 'जैसा नाम वैसा काम' की लोकोक्ति का प्रयोग करना बिल्कुल उपयुक्त होगा । 'आंबेडकरवादी साहित्य' चैनल पर अपलोड की गयी गीतों की सूची नीचे दी जा रही है :- 1. जिंदगी प्यार का गीत है बुद्ध से कोई प्यारा नहीं बुद्ध जैसा सहारा नहीं झूठ के ऐसे संसार में बुद्ध के बिन गुजारा नहीं बुद्ध से जो भी अनजान है वो अभागा परेशान है नासमझ और नादान है बुद्ध को जो निहारा नहीं झूठ के ऐसे ................ अंधेरे में या करते हो क्यों परछाई पकड़ते हो क्यों उस नदी में उतरते हो क्यों जिसका कोई किनारा नहीं झूठ के ऐसे ................ ढोंग से किसको क्या है मिला बंद कर दो ये सब सिलसिला फिर कभी ना ये करना गिला कि 'प्रखर' ने पुकारा नहीं झूठ के ऐसे ................ 2...