नारीवाद की पों-पों (नारी-विमर्श की कविता)
नारी-मुक्ति का प्रश्न अत्यंत गंभीर और आवश्यक है, किंतु हर वह विमर्श जो स्वयं को 'नारीवाद' कहता है, समतावादी हो - यह आवश्यक नहीं। डॉ. भीमराव आंबेडकर का चिंतन स्त्री-मुक्ति को सामाजिक न्याय, समान अधिकार और मानवीय गरिमा के व्यापक संदर्भ में देखता है, न कि स्त्री बनाम पुरुष के संघर्ष के रूप में।
यह कविता उसी बिंदु पर हस्तक्षेप करती है, जहाँ नारी-विमर्श, सामाजिक एकता की बजाय वैचारिक ध्रुवीकरण और लिंग-आधारित दूरी को बढ़ावा देने लगता है। यह रचना स्त्री-विरोध नहीं, बल्कि विभाजनकारी विचारधाराओं की आलोचना है और आंबेडकरवादी समतामूलक दृष्टि की पुनर्स्थापना का प्रयास है।
'नारीवाद की पों-पों' कविता 'विषमता के विरुद्ध' नामक पुस्तक में संग्रहीत है। यह कविता नारी-विमर्श से संबंधित है, किंतु इसमें 'नारीवाद' शब्द का विरोध किया गया है।
नारीवाद की पों-पों
(नारी-विमर्श की कविता)
लिंगवाद की बातें
समतावाद नहीं है ।
आंबेडकरवाद का हिस्सा
नारीवाद नहीं है ।।
आंबेडकरवादी चिंतन को
समझो और जानो ।
पहले सच्चे आंबेडकरवादी
को पहचानो ।।
📝 नारी-विमर्श पर आधारित देवचंद्र भारती 'प्रखर' की एक अन्य कविता 👉 'कटु यथार्थ' को भी पढ़ें।
नारीवाद की पों-पों से
हो रहा प्रदूषण ।
स्त्री-पुरुष के बीच दूरियाँ
बढ़तीं क्षण-क्षण ।।
सामाजिक आंदोलन में
आयी है बाधा ।
कैसी क्रांति करेगा
जो है हिस्सा आधा ।।
आलोचनात्मक टिप्पणी
यह कविता नारी-विमर्श के उस स्वरूप पर प्रश्न उठाती है, जो सामाजिक एकता को कमजोर करता है। आंबेडकरवादी चिंतन में स्त्री-मुक्ति अनिवार्य है, पर वह लिंग-संघर्ष नहीं, सामाजिक पुनर्रचना का हिस्सा है। कविता का तेवर असहज कर सकता है। लेकिन यही इसका उद्देश्य है - सोच को झकझोरना।
निष्कर्ष
स्त्री-मुक्ति और सामाजिक क्रांति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। किंतु जब कोई विमर्श समानता के नाम पर समाज को दो खेमों में बाँट देता है, तब वह मुक्ति का नहीं, टकराव का मार्ग बन जाता है। आंबेडकरवादी चिंतन हमें सिखाता है कि सच्ची क्रांति सहयोग, समता और विवेक से आती है—न कि लिंग-आधारित श्रेष्ठता या पीड़ित-बोध की राजनीति से। यह कविता उसी मूल चेतना की ओर लौटने का आग्रह है।
✍️ लेखक - देवचंद्र भारती 'प्रखर'
(आंबेडकरवादी साहित्यकार एवं चिंतक)
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