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जनवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

राजभाषा की गरिमा: विद्यालयी संभाषण संस्कृति और हिंदी का सम्मान

विद्यालयों में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम केवल गीत, नृत्य, संगीत और नाटक तक सीमित नहीं होते। इन कार्यक्रमों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष संभाषण (Speech) भी है, जो विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण, विचार अभिव्यक्ति और राष्ट्रीय चेतना के विकास में अहम भूमिका निभाता है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए संभाषण-संग्रह पुस्तक ‘देशप्रेम’ की रचना की गई है। इस पुस्तक के लेखक प्रख्यात साहित्यकार एवं समालोचक देवचंद्र भारती ‘प्रखर’ हैं। प्रस्तुत ब्लॉग में इसी संग्रह से लिया गया एक प्रेरक संभाषण — “राजभाषा की गरिमा” — पाठकों के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है। हिंदी और राष्ट्रीय चेतना हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है। संविधान हमें अपनी राष्ट्रभाषा का सम्मान करने का नैतिक और सांवैधानिक दायित्व देता है। अन्य भाषाओं का ज्ञान अर्जन करना आवश्यक है, किंतु दैनिक जीवन में हिंदी का प्रयोग करना राष्ट्र के सांस्कृतिक अस्तित्व को जीवित रखने के लिए अनिवार्य है। आज स्थिति यह है कि भारत का बड़ा वर्ग हिंदी की उपेक्षा कर अंग्रेजी को प्राथमिकता दे रहा है। यह प्रवृत्ति केवल भाषा परिवर्तन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम...

मातृभूमि और देशभूमि : सपूतों की पहचान का आधार

विद्यालयों में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गीत, नृत्य, संगीत और नाटक के साथ-साथ संभाषण (संवाद/भाषण) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास, राष्ट्रबोध और नैतिक चेतना को सुदृढ़ करने में संभाषण एक सशक्त माध्यम है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए संभाषण-संग्रह पुस्तक ‘देशप्रेम’ का सृजन किया गया है। इस पुस्तक के लेखक प्रख्यात साहित्यकार एवं समालोचक देवचंद्र भारती ‘प्रखर’ हैं। प्रस्तुत ब्लॉग में इसी पुस्तक से चयनित संभाषण “मातृभूमि और देशभूमि” को विचारात्मक रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। जन्मभूमि, मातृभूमि और देशभूमि का अर्थ जिस भूमि पर हमारा जन्म होता है, उसे जन्मभूमि कहा जाता है। जहाँ हमारा पालन-पोषण होता है, वह हमारी मातृभूमि होती है। जिस देश के हम नागरिक होते हैं, उस देश की भूमि हमारी देशभूमि कहलाती है। अनेक बार ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति का जन्म एक स्थान पर, पालन-पोषण किसी अन्य स्थान पर और मृत्यु किसी तीसरे स्थान पर होती है। इस स्थिति में उसकी जन्मभूमि, मातृभूमि और मृत्यु-भूमि अलग-अलग हो सकती हैं। परंतु यदि ये सभी घटनाएँ एक ही देश की सीमा के भीत...

दीपावली और दीपदानोत्सव : समान नहीं, अलग अवधारणाएँ — एक तार्किक विमर्श

हर वर्ष कार्तिक अमावस्या के अवसर पर देशभर में दीपावली मनाई जाती है। साथ ही, कुछ वर्षों से “दीपदानोत्सव” शब्द का प्रयोग भी सामने आया है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या दीपावली और दीपदानोत्सव एक ही हैं? क्या इन दोनों का हिंदू धर्म या बौद्ध धम्म से कोई वास्तविक संबंध है? और क्या “दीपदानोत्सव” को बौद्ध पर्व के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? इन प्रश्नों के उत्तर भावनाओं से नहीं, बल्कि तथ्य, इतिहास और तर्क से खोजे जाने चाहिए। दीपावली और दीपदानोत्सव : शब्दार्थ का अंतर किसी भी परंपरा को समझने से पहले उसके शब्दार्थ को समझना आवश्यक है। दीपावली = दीप + अवलि अर्थात् — दीपों की पंक्ति। जब दीप जलाकर उन्हें सजावटी रूप में एक क्रम में लगाया जाता है, तो उसे दीपावली कहा जाता है। दीपदानोत्सव = दीपदान + उत्सव दीपदान का अर्थ है — दीप का दान करना। अर्थात् किसी इष्टदेव या धार्मिक संस्था को दीप अर्पित करना। स्पष्ट है कि दोनों शब्दों की अवधारणा अलग है। एक सजावटी और लोकपरंपरा आधारित है, दूसरी दान-आधारित धार्मिक प्रक्रिया से जुड़ी है। दीपावली और हिंदू परंपरा : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हिंदू (ब्राह्मण धर्म) प...

भारतीय संविधान दिवस : उत्सव नहीं, संवैधानिक चेतना का संकल्प

भारत में प्रत्येक वर्ष 26 नवंबर को भारतीय संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका कारण यह है कि 26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान पूरी तरह बनकर तैयार हुआ था और इसी दिन संविधान सभा में इसे औपचारिक रूप से प्रस्तुत किया गया था। भारतीय संविधान के शिल्पकार बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर माने जाते हैं। वे संविधान निर्मात्री समिति के अध्यक्ष थे। उनके नेतृत्व और अथक परिश्रम के परिणामस्वरूप मात्र 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान तैयार हुआ। हालाँकि संविधान को पूरे देश में 26 जनवरी 1950 से लागू किया गया, इसलिए इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है, जबकि 26 नवंबर को संविधान की वैचारिक जन्मतिथि माना जाता है। संविधान दिवस मनाना और संविधान को मानना — दो अलग बातें संविधान दिवस मनाना एक बात है, लेकिन संविधान को दिल से स्वीकार करना बिल्कुल दूसरी बात। भारतीय संविधान में अनेक देशों के संविधानों से श्रेष्ठ तत्वों का समावेश किया गया है। यह तथ्य डॉ. आंबेडकर की वैचारिक व्यापकता, बौद्धिक परिपक्वता और वैश्विक दृष्टि का प्रमाण है। लेकिन आज की सच्चाई यह है कि लोग संविधान दिव...

समता और समानता : क्या दोनों एक ही हैं? — आंबेडकरवादी दृष्टि से एक आवश्यक विमर्श

प्रायः सार्वजनिक बहसों, भाषणों और नीतिगत घोषणाओं में “समता” और “समानता” शब्दों का प्रयोग एक-दूसरे के पर्याय के रूप में किया जाता है। लेकिन क्या वास्तव में दोनों का अर्थ एक ही है? ambedkarvadi वैचारिक परंपरा इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट रूप से नकारात्मक देती है। यह अंतर केवल शब्दार्थ का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की पूरी दिशा को निर्धारित करने वाला है। समानता (Equality) : कानूनी बराबरी का सिद्धांत समानता का मूल अर्थ है — सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समान अधिकार और अवसर प्रदान करना। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 “कानून के समक्ष समानता” की बात करता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य किसी नागरिक के साथ भेदभाव न करे। लेकिन समस्या यह है कि: समानता मान लेती है कि समाज पहले से बराबर है, जबकि वास्तविक समाज गहरे स्तर पर असमान है। यदि असमान समाज में सभी को “एक जैसा” व्यवहार दिया जाए, तो यह न्याय नहीं बनता — बल्कि असमानता को स्थायी बना देता है। समता (Equity): सामाजिक न्याय की अनिवार्य शर्त समता का अर्थ है — असमान परिस्थितियों को पहचानकर न्यायपूर्ण संतुलन स्थापित करना। डॉ. आंबेडकर के अनु...

देवचंद्र भारती प्रखर कौन हैं? : वैचारिक यात्रा

देवचंद्र भारती ‘प्रखर’ समकालीन हिंदी साहित्य और वैचारिक विमर्श के क्षेत्र में एक सक्रिय आंबेडकरवादी लेखक, विचारक और वैचारिक कार्यकर्ता के रूप में अपनी स्पष्ट पहचान स्थापित कर रहे हैं। उनका लेखन केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, संवैधानिक चेतना और वैचारिक पुनर्निर्माण की दिशा में एक सशक्त हस्तक्षेप है। वे साहित्य को मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि वैचारिक संघर्ष और सामाजिक परिवर्तन का औजार मानते हैं। इसी दृष्टि से उनका लेखन आंबेडकर-दर्शन, बौद्ध विचार परंपरा और आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों से प्रेरित दिखाई देता है। 1. वैचारिक पृष्ठभूमि देवचंद्र भारती ‘प्रखर’ की वैचारिक आधारशिला डॉ. भीमराव आंबेडकर के सामाजिक न्याय दर्शन, बुद्ध के करुणा-आधारित चिंतन और संवैधानिक मूल्यों पर टिकी हुई है। वे मानते हैं कि समाज की वास्तविक मुक्ति केवल राजनीतिक परिवर्तन से नहीं, बल्कि चेतना परिवर्तन से संभव है। उनका लेखन जाति-आधारित शोषण, सामाजिक असमानता, सांस्कृतिक वर्चस्व और वैचारिक भ्रम के विरुद्ध स्पष्ट वैचारिक प्रतिरोध प्रस्तुत करता है। 2. लेखन की दिशा और उद्देश्य देवचंद्र भारती ‘प्र...

आंबेडकरवादी साहित्य और मेरी भूमिका - देवचंद्र भारती 'प्रखर'

आंबेडकरवादी साहित्य मेरे लिए केवल एक साहित्यिक धारा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की वैचारिक परियोजना है। यह वह साहित्य है जो डॉ. भीमराव आंबेडकर के दर्शन—समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और मानव गरिमा—को रचनात्मक अभिव्यक्ति देता है। मैं इसे भावनात्मक नारेबाज़ी नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि, ऐतिहासिक चेतना और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित वैचारिक आंदोलन मानता हूँ। मेरी भूमिका इस परंपरा में केवल लेखक की नहीं है, बल्कि एक वैचारिक हस्तक्षेपकर्ता की है। मैं अपने लेखन के माध्यम से आंबेडकरवादी विचारधारा को लोकप्रिय नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से सुदृढ़ बनाना चाहता हूँ। मेरा प्रयास रहा है कि साहित्य को आंदोलन से जोड़ा जाए, किंतु उसे बौद्धिक अनुशासन से अलग न किया जाए। आज आंबेडकरवादी साहित्य के नाम पर कई बार सतही लेखन और भावनात्मक अतिवाद देखने को मिलता है। मैं इससे असहमति रखता हूँ। मेरे लिए आंबेडकरवादी साहित्य का अर्थ है—तथ्यों पर आधारित आलोचना, तर्कशील विमर्श और सामाजिक संरचनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण। इसी दृष्टि से मैंने आंबेडकरवादी साहित्य प्रकाशन और वैचारिक पत्रिका “आंबेडकरवादी साहित्य” के माध्यम से गंभीर लेखन...

मैं क्यों लिखता हूँ? — एक आंबेडकरवादी लेखक का वैचारिक वक्तव्य

मैं लिखता हूँ, क्योंकि चुप्पी अन्याय को मजबूत करती है। मैं लिखता हूँ, क्योंकि समाज में व्याप्त असमानता, जातिगत शोषण और बौद्धिक पाखंड केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि वैचारिक हस्तक्षेप से चुनौती दिए जा सकते हैं। मेरे लिए लेखन आत्मप्रदर्शन नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है। डॉ. भीमराव आंबेडकर की विचारधारा ने मुझे यह सिखाया कि साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन नहीं, बल्कि चेतना निर्माण होना चाहिए। इसलिए मेरा लेखन सामाजिक न्याय, संविधान आधारित लोकतंत्र, समानता और मानवीय गरिमा के पक्ष में खड़ा होता है। आज के समय में विचारों को जानबूझकर भ्रमित किया जा रहा है। इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है और बहुजन समाज की चेतना को कमजोर करने के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे समय में लेखक का दायित्व और बढ़ जाता है। मैं अपने लेखन के माध्यम से इस वैचारिक भ्रम के विरुद्ध तर्क, तथ्य और वैज्ञानिक दृष्टि प्रस्तुत करना चाहता हूँ। यह ब्लॉग केवल मेरी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति नहीं है। यह उन सभी लोगों के लिए है जो सोचते हैं, सवाल करते हैं और एक न्यायपूर्ण समाज की कल्पना करते हैं। मेरा उद्देश्य लोकप्रियता नहीं, बल्कि वैचारिक स्पष्टता है। यद...