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संविधान और गणतंत्र (विद्यालय कार्यक्रम हेतु छात्र भाषण)

आदरणीय प्रधानाचार्य महोदय, सम्मानित गुरुजनों और मेरे प्रिय भाइयों एवं बहनों, आज मैं “संविधान और गणतंत्र” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए उपस्थित हूँ। सन् 1947 में जब हमारा देश अंग्रेजी शासन से स्वतंत्र हुआ, तब देश के नेताओं और बुद्धिजीवियों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न था—अब देश कैसे चलेगा? शासन की व्यवस्था कैसी होगी? इस पर विचार करने के लिए संविधान सभा का गठन किया गया। इस सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे। सभा के विद्वानों और नेताओं ने मिलकर एक संविधान समिति बनाई, जिसके अध्यक्ष डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर बने। उनके मार्गदर्शन में संविधान का निर्माण प्रारंभ हुआ। संविधान को तैयार करने में 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा। इसे 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा में प्रस्तुत किया गया और 26 जनवरी 1950 को पूरे देश में लागू कर दिया गया। इसी दिन से भारत एक गणतंत्र राष्ट्र बना। इसी भावना को व्यक्त करती आपकी पंक्तियाँ— नया नियम चल उठा इस भारत देश में, हर कोई मचल उठा इस भारत देश में। लोकतंत्र लागू हुआ जिस समय ‘प्रखर’, घर-घर दिया जल उठा इस भारत देश में।। इन पंक्तियों का अर्थ है कि जब देश में लोक...

देशप्रेम (विद्यालय कार्यक्रम हेतु छात्र भाषण)

आदरणीय प्रधानाचार्य महोदय, सम्मानित गुरुजनों और मेरे प्रिय भाइयों एवं बहनों, आज मैं “देशप्रेम” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए उपस्थित हूँ। “देशप्रेम” शब्द हम सबके लिए नया नहीं है। हम अपने गुरुजनों से, मित्रों से और परिवार के सदस्यों से यह शब्द सुनते रहते हैं। हम देशप्रेम पर आधारित कविताएँ और कहानियाँ भी पढ़ते हैं। लेकिन कभी-कभी मन में एक प्रश्न उठता है—देश से प्रेम करना वास्तव में क्या है? माता-पिता से प्रेम करना सहज है। भाई-बहन से प्रेम करना स्वाभाविक है। मित्रों से प्रेम करना सरल है। पर देश से प्रेम कैसे करें? देश तो कोई व्यक्ति नहीं है। देश बहुत बड़ा है। उसमें अनेक प्रदेश हैं, अनेक नदियाँ हैं, पहाड़ हैं, जंगल हैं। हम उसे अधिकतर नक्शे में देखते हैं। फिर हम उससे प्रेम कैसे करें? हमारे गुरुजन हमें बताते हैं कि देश से प्रेम करने का अर्थ है—देश के लोगों से प्रेम करना, उसकी प्रकृति का सम्मान करना और उसकी व्यवस्था का पालन करना। लेकिन कभी मन में यह प्रश्न भी आता है—यदि देश के लोग हमसे प्रेम न करें, तो क्या हम उनसे प्रेम करें? इसी भावना को व्यक्त करती कुछ पंक्तियाँ मैं प्रस्तुत करन...

संत काव्य परंपरा और संत रविदास का काव्य

निर्गुणमार्गी संत-काव्य भक्तिकालीन हिन्दी साहित्य का आरंभिक अंश है । आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने नामदेव एवं कबीर द्वारा प्रवर्तित भक्ति धारा को 'निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा' की संज्ञा से अभिहित किया है । डाॅ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे 'निर्गुण भक्ति साहित्य' तथा डाॅ० रामकुमार वर्मा ने इसे 'संत काव्य परंपरा' का नाम दिया है । 'संत' शब्द की व्युत्पत्ति और परिभाषा  (1) पाणिनीय अष्टाध्यायी सूत्र 'कंशम्यां वभयुस्तितुचसः' के अनुसार 'शम्' शब्द 'त' प्रत्यय से संयुक्त होकर 'शान्त' बन जाता है । इसी का अपभ्रंश 'संत' शब्द है । (2) 'सत्' शब्द का प्रथमा विभक्ति के बहुवचन में 'संतः' रूप बनता है । उसी का अपभ्रंश 'संत' शब्द सत्पुरुषों के लिए हिन्दी में प्रयुक्त होता है । (3) वैदिक निघण्टु में 'सन्' शब्द जल का भी पर्याय माना गया है । वहाँ पर टीकाकार ने 'सन्' का अर्थ लिखा है, 'सर्वदा विद्यमान प्रलयेऽपि नाशाभावात्' । प्रलय काल में भी जल का अभाव नहीं होता । ध्यान देने पर यह स्पष्ट हो जा...

भोजपुरी बिरहा ( संपूर्ण जानकारी )

भोजपुरी बिरहा के विषय में सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करने वाली पहली पुस्तक है - 'भोजपुरी बिरहा' 2013 । भोजपुरी बिरहा नाम की इस पुस्तक में बिरहा संबंधी अनेक प्रश्नों के उत्तर समाहित हैं । इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य बिरहा की आलोचना करना नहीं है बल्कि भोजपुरी कवियों का ध्यान उत्कृष्ट साहित्य की ओर आकृष्ट करना है । इस पुस्तक में 'बिरहा का उद्भव और विकास', 'बिरहा का नामकरण', 'बिरहा में अखाड़ेबाजी', 'बिरहा में जातिवाद', 'बिरहा का दंगल', 'बिरहा के अंग' और 'बिरहा का मूल्यांकन' आदि शीर्षकों के अंतर्गत मैंने मैं अपने विचारों को अभिव्यक्त किया है । चूँकि बिरहा भोजपुरी क्षेत्र की बहुचर्चित और श्रेष्ठ काव्य रचना के रूप में मान्य है, इसलिए एकाएक इसकी आलोचना करने से बिरहा प्रेमियों को अनुचित लगेगा । अतः बुद्धिजीवियों से मेरा अनुरोध है कि वे भावुकता त्यागकर बुद्धिपूर्वक अमल करेंगे । भोजपुरी बिरहा का उद्भव एवं विकास Bhojpuri Birha Ka Udbhav Evam Vikas सुनने को मिलता है कि भोजपुरी बिरहा की रचना करने का आरंभ सर्वप्रथम किसी बिहारी ( यह हिं...

तिरंगे की मर्यादा (संभाषण)

प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अंतर्गत गीत, नृत्य, संगीत, नाटक आदि के अतिरिक्त संभाषणों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है । विद्यालयों में संभाषण की बढ़ती आवश्यकता को ध्यान में रखकर संभाषण-संग्रह की पुस्तक 'देशप्रेम' की रचना की गयी है । इस पुस्तक के लेखक प्रख्यात साहित्यकार एवं समालोचक देवचंद्र भारती 'प्रखर' हैं । प्रस्तुत है इस पुस्तक से एक संभाषण । तिरंगे की मर्यादा  Tirange Ki Maryada  जिस समय भारतवर्ष पराधीन था, उस समय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को खुलेआम फहराने का अधिकार नहीं था । तिरंगे की मर्यादा को बनाए रखने के लिए कितने ही वीर शहीद हो गए । जब किसी ने तिरंगे पर थूका, उसका मुंह फोड़ दिए । जब किसी ने तिरंगे को पैरों से रौंदा, उसका पैर तोड़ दिए । यहां तक कि तिरंगे को जमीन पर गिरने से बचाने के लिए कितने ही वीर हंसते-हंसते बारूद में जल गए । गोलियों से सीना छलनी हो गया मगर तिरंगे को झुकने नहीं दिए । तिरंगा है निशान वीरों के जुनून का  जिनको नसीब हो सका न पल सुकून का  इस तिरंगे के रंगों पर अमल करो प्रखर  तिरंगे में स...

छंद परिचय और छंद नियम (हिंदी साहित्य)

हिंदी में छंद दो प्रकार के हैं -  मात्रिक छंद   और वार्णिक छंद ।  मात्रिक छंद में मात्राओं की गणना की जाती है तथा वार्णिक छंद में वर्णों की गणना की जाती है । मात्राएँ दो प्रकार की होती हैं - लघु मात्रा और दीर्घ मात्रा ।  >>  लघु मात्रा :  लघु मात्रा में एक मात्रा होती है । जिसका संकेत अंग्रेजी का 'आई' अक्षर (I) है ।  हिंदी वर्णमाला की सभी ह्रस्व स्वरों में लघु मात्रा होती है । जैसे - अ, इ, उ आदि । >>  दीर्घ मात्रा :  दीर्घ मात्रा में दो मात्रा होती है । दीर्घ  मात्रा को 'गुरु मात्रा' भी कहते हैं, जिसका संकेत अंग्रेजी का 'एस' अक्षर (S) है । हिंदी वर्णमाला की सभी दीर्घ स्वरों और संयुक्ताक्षरों में लघु मात्रा होती है । जैसे - आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः, क्ष, त्र, ज्ञ आदि । >>  गण :   गण का अर्थ समूह है । तीन अक्षरों को मिलाकर एक गण (समूह) बनता है । भारतीय विद्वानों द्वारा आठ गण निर्धारित किये गये हैं । गणों को याद करने के लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है - सूत्र :   यमाताराजभानसरगा ...