देशप्रेम (विद्यालय कार्यक्रम हेतु छात्र भाषण)
आदरणीय प्रधानाचार्य महोदय, सम्मानित गुरुजनों और मेरे प्रिय भाइयों एवं बहनों,
आज मैं “देशप्रेम” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत करने के लिए उपस्थित हूँ।
“देशप्रेम” शब्द हम सबके लिए नया नहीं है। हम अपने गुरुजनों से, मित्रों से और परिवार के सदस्यों से यह शब्द सुनते रहते हैं। हम देशप्रेम पर आधारित कविताएँ और कहानियाँ भी पढ़ते हैं।
लेकिन कभी-कभी मन में एक प्रश्न उठता है—देश से प्रेम करना वास्तव में क्या है?
माता-पिता से प्रेम करना सहज है। भाई-बहन से प्रेम करना स्वाभाविक है। मित्रों से प्रेम करना सरल है। पर देश से प्रेम कैसे करें? देश तो कोई व्यक्ति नहीं है। देश बहुत बड़ा है। उसमें अनेक प्रदेश हैं, अनेक नदियाँ हैं, पहाड़ हैं, जंगल हैं। हम उसे अधिकतर नक्शे में देखते हैं। फिर हम उससे प्रेम कैसे करें?
हमारे गुरुजन हमें बताते हैं कि देश से प्रेम करने का अर्थ है—देश के लोगों से प्रेम करना, उसकी प्रकृति का सम्मान करना और उसकी व्यवस्था का पालन करना।
लेकिन कभी मन में यह प्रश्न भी आता है—यदि देश के लोग हमसे प्रेम न करें, तो क्या हम उनसे प्रेम करें?
इसी भावना को व्यक्त करती कुछ पंक्तियाँ मैं प्रस्तुत करना चाहता हूँ—
हम उनसे क्यों इजहार करें?
हम उनसे क्यों इकरार करें?
वे हमसे मिलते नहीं ‘प्रखर’,
तो हम उनसे क्यों प्यार करें?
भाइयों एवं बहनों, जब हम ऐसा सोचते हैं, तो हमारे गुरुजन हमें समझाते हैं कि प्रेम का आरंभ स्वयं से करना पड़ता है। जब हम दूसरों से सम्मानपूर्वक व्यवहार करेंगे, तभी समाज में सद्भाव बढ़ेगा।
यह भी सच है कि हर बार प्रेम के बदले प्रेम नहीं मिलता। कभी-कभी व्यवहार कठोर होता है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपना कर्तव्य छोड़ दें। संसार में सभी लोग एक जैसे नहीं होते।
देशप्रेम का अर्थ केवल भावना व्यक्त करना नहीं है। देशप्रेम का अर्थ है—अपने दायित्व को निभाना। समय पर अपना कार्य करना, नियमों का पालन करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और गुरुजनों का सम्मान करना—ये सब देशप्रेम के ही रूप हैं।
देशप्रेम नारों से नहीं, व्यवहार से प्रकट होता है। यह केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म में दिखाई देता है।
अतः हम सब यह संकल्प लें कि अपने गुरुजनों की आज्ञा का पालन करेंगे और अपने कर्तव्य से कभी भी, किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होंगे।
देश की खातिर हमेशा काम करेंगे,
अपने देश का दुनिया में नाम करेंगे।
आज से हम अपने आज़ाद भारत का,
अपने आप को ‘प्रखर’ गुलाम करेंगे।।
इसी भावना के साथ मैं अपने शब्दों को विराम देता हूँ।
धन्यवाद।