आलोचना और समालोचना : अंतर का प्रश्न या भाषाई तसल्ली?
हिंदी साहित्यिक संसार में आलोचना और समालोचना दो शब्द बहुत प्रचलित हैं। साहित्यिक लेखन में कई बार इन दोनों के बीच अंतर बताने की कोशिश की जाती है। कुछ लोग कहते हैं कि आलोचना सामान्य परीक्षण है और समालोचना संतुलित विवेचन है; कुछ इसे विश्लेषण और निर्णय का अंतर बताते हैं। लेकिन जब हिंदी साहित्य के वास्तविक व्यवहार को देखा जाता है, तो यह पूरा अंतर काफी हद तक भाषाई तसल्ली जैसा दिखाई देता है। साहित्यिक जीवन में दोनों शब्दों के बीच जो भारी अंतर खड़ा किया जाता है, वह व्यवहार में लगभग गायब है।
आलोचना : अर्थ और अंग्रेज़ी शब्द
आलोचना का अर्थ है—किसी साहित्यिक कृति का परीक्षण, विश्लेषण और मूल्यांकन। अंग्रेज़ी में इसके लिए सामान्य शब्द है—Criticism, अर्थात् किसी साहित्यिक कृति या विचार का विश्लेषण और मूल्यांकन। हिंदी साहित्य में यह शब्द पूरी तरह स्थापित है। इसलिए हम सहज रूप से कहते हैं—हिंदी आलोचना, साहित्यिक आलोचना, आधुनिक आलोचना और जो व्यक्ति यह कार्य करता है, उसे आलोचक कहा जाता है।
समालोचना : अर्थ और अंग्रेज़ी शब्द
समालोचना शब्द ‘सम् + आलोचना’ से बना है। इसका शाब्दिक अर्थ है—सम्यक या संतुलित आलोचना। अंग्रेज़ी में इसके लिए सामान्यतः ये शब्द बताए जाते हैं—Critical Analysis, Critical Evaluation अर्थात् किसी रचना का अपेक्षाकृत व्यवस्थित या संतुलित अध्ययन। सैद्धान्तिक स्तर पर यह कहा जाता है कि समालोचना अधिक संतुलित और क्रमबद्ध आलोचना है।
हिंदी साहित्य का व्यवहारिक सत्य
अब साहित्यिक व्यवहार की वास्तविकता देखिए। हिंदी साहित्य में जिन लोगों को हम जानते हैं—वे सभी आलोचक कहलाते हैं, समालोचक नहीं। हम कहते हैं—
• आलोचक रामचंद्र शुक्ल
• आलोचक हजारीप्रसाद द्विवेदी
• आलोचक नामवर सिंह
लेकिन कोई यह नहीं कहता—
• समालोचक रामचंद्र शुक्ल
• समालोचक नामवर सिंह
इसी प्रकार अंग्रेज़ी के Literary Criticism का हिंदी रूप साहित्यिक आलोचना है, साहित्यिक समालोचना नहीं। यह स्थिति एक सीधी बात स्पष्ट करती है—हिंदी साहित्य में आलोचना शब्द ही स्वीकृत और व्यवहार में स्थापित शब्द है।
फिर अंतर क्यों बताया जाता है?
आलोचना और समालोचना के बीच अंतर बताने का प्रयास अधिकतर सैद्धान्तिक स्तर पर किया जाता है। लेकिन व्यवहार में यह अंतर अक्सर कृत्रिम लगता है। क्योंकि दोनों का काम एक ही है—किसी रचना का परीक्षण और मूल्यांकन।
इस पूरे प्रश्न को बहुत सरल ढंग से समझा जा सकता है—
• तीखी आलोचना → आलोचना
• मीठी आलोचना → समालोचना
जब आलोचना का स्वर प्रहारात्मक या तीखा होता है, तो उसे आलोचना कहा जाता है।
जब वही आलोचना संतुलित, संयत या सौम्य भाषा में होती है, तो उसे समालोचना कह दिया जाता है। लेकिन मूल काम दोनों में एक ही रहता है—साहित्यिक कृति का परीक्षण और मूल्यांकन।
वास्तविक निष्कर्ष
स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो— आलोचना और समालोचना का कार्य समान है। दोनों का उद्देश्य साहित्यिक कृति का मूल्यांकन करना है। हिंदी साहित्य में व्यवहारिक रूप से आलोचना शब्द ही प्रमुख और स्वीकृत है। समालोचना शब्द का प्रयोग बहुत कम होता है और जब होता भी है, तो वह प्रायः आलोचना के सौम्य रूप के लिए किया जाता है। इसलिए यह कहना अधिक यथार्थपूर्ण है कि आलोचना और समालोचना के बीच जो बड़ा सैद्धान्तिक अंतर बताया जाता है, वह प्रायः मानसिक संतोष का विषय है, साहित्यिक व्यवहार का नहीं।
— देवचंद्र भारती 'प्रखर'
आंबेडकरवादी साहित्यकार एवं चिंतक