आंबेडकरवादी दृष्टि में कांशीराम : BAMCEF से बसपा तक की वैचारिक यात्रा

मान्यवर कांशीराम (15 मार्च 1934 — 9 अक्टूबर 2006) भारतीय बहुजन राजनीति के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्वों में से एक रहे हैं। उन्होंने संगठित बहुजन चेतना को राजनीतिक शक्ति में रूपांतरित करने का प्रयास किया। किंतु आंबेडकरवादी दृष्टि से जब हम कांशीराम के वैचारिक सफ़र का मूल्यांकन करते हैं, तो यह यात्रा केवल उपलब्धियों की नहीं, बल्कि वैचारिक सीमाओं, संगठनात्मक प्रयोगों और अंतर्विरोधों की भी यात्रा बन जाती है।

कांशीराम और जातिगत भेदभाव का पहला अनुभव

कांशीराम का सामाजिक चेतना से पहला टकराव उनके सरकारी सेवा काल में हुआ। उन्होंने देखा कि डॉ. आंबेडकर जयंती के अवसर पर अवकाश लेने वाले कर्मचारियों के साथ कार्यालयों में भेदभाव किया जाता था। यह अनुभव उनके लिए निर्णायक मोड़ बना।

बताया जाता है कि इसी समय उन्होंने डॉ. आंबेडकर की प्रसिद्ध पुस्तक "Annihilation of Caste" का अध्ययन किया, जिसने उनके भीतर सामाजिक परिवर्तन की चेतना को और अधिक तीव्र किया। यहीं से वे एक कर्मचारी से सामाजिक कार्यकर्ता की यात्रा पर निकल पड़े।

BAMCEF : संगठनात्मक प्रयोग का प्रारंभ

प्रारंभिक दौर में कांशीराम ने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) से जुड़ाव रखा, किंतु कांग्रेस से उसकी निकटता के कारण उन्होंने इससे दूरी बना ली। इसके बाद उन्होंने 1971 में ऑल इंडिया एससी, एसटी, ओबीसी एंड माइनॉरिटीज एम्प्लॉइज फेडरेशन की स्थापना की, जो आगे चलकर 1978 में BAMCEF (Backward and Minority Communities Employees Federation) बना।

BAMCEF का उद्देश्य

BAMCEF का लक्ष्य था —

• शिक्षित बहुजन वर्ग को संगठित करना।

• आंबेडकरवादी वैचारिक चेतना का प्रसार।

• नौकरशाही और मध्यवर्गीय बहुजन तबके को सामाजिक आंदोलन से जोड़ना।

यह संगठन न तो राजनीतिक था और न धार्मिक। यह वैचारिक कैडर निर्माण का प्रयोग था। लेकिन BAMCEF की एक सीमा यह भी रही कि इसका आधार मुख्यतः शहरी, सरकारी नौकरीपेशा वर्ग तक सीमित रहा। ग्रामीण शोषित समुदाय इससे पर्याप्त रूप से नहीं जुड़ पाये।

DS4 से BSP तक : राजनीतिक प्रवेश

1981 में कांशीराम ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (DS4) का गठन किया। यह संगठन सीधे राजनीतिक चेतना निर्माण की दिशा में पहला कदम था।

इसके बाद 1984 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) की स्थापना की। उद्देश्य स्पष्ट था — बहुजन वोट को सत्ता में बदलना। उत्तर प्रदेश में BSP को उल्लेखनीय सफलता मिली और बहुजन राजनीति एक राष्ट्रीय विमर्श बनी।

बहुजन अवधारणा पर आंबेडकरवादी प्रश्न

यहाँ एक महत्वपूर्ण वैचारिक प्रश्न उठता है। डॉ. आंबेडकर की बहुजन अवधारणा मूलतः शोषित मानवता की व्यापक अवधारणा थी। किंतु कांशीराम ने इसे व्यावहारिक राजनीति में सीमित करते हुए मुख्यतः SC-ST-OBC समीकरण तक संकुचित कर दिया। इस संकुचन ने राजनीतिक लाभ तो दिया, लेकिन वैचारिक विस्तार को सीमित कर दिया।

उत्तराधिकार और सत्ता की राजनीति

2001 में स्वास्थ्य कारणों से कांशीराम ने मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। यह निर्णय उनके जीवन का सबसे विवादास्पद मोड़ भी बना। कांशीराम ने अपने परिवार के किसी सदस्य को राजनीतिक उत्तराधिकारी नहीं बनाया — यह उनकी सामाजिक चेतना का सकारात्मक पक्ष था। लेकिन बाद के वर्षों में BSP के भीतर उभरे परिवारवाद और सत्ता-केंद्रित राजनीति ने आंबेडकरवादी मूल्यों से दूरी बढ़ा दी।

बौद्ध धम्म ग्रहण की अधूरी लालसा

2002 में कांशीराम ने घोषणा की कि वे 14 अक्टूबर 2006 को — डॉ. आंबेडकर के धम्म परिवर्तन की 50वीं वर्षगांठ पर — बौद्ध धम्म ग्रहण करेंगे। उनकी इच्छा थी कि उनके साथ करोड़ों समर्थक भी धम्म ग्रहण करें। अफसोस, 9 अक्टूबर 2006 को उनका निधन हो गया और यह ऐतिहासिक संकल्प अधूरा रह गया।

कांशीराम की वैचारिक लेखनी

कांशीराम केवल संगठनकर्ता ही नहीं, वैचारिक लेखक भी थे।

"चमचा युग" (1982)

इस पुस्तक में उन्होंने दलित नेतृत्व की तीखी आलोचना की और सत्ता दलों से समझौता करने वाले नेताओं को "चमचा" कहा। उनका तर्क था कि बिना वैचारिक स्वतंत्रता के बहुजन राजनीति केवल सत्ता का उपकरण बन जाती है।

"Birth of BAMCEF"

इस पुस्तक में उन्होंने अपने संगठनात्मक प्रयोग की वैचारिक पृष्ठभूमि को दर्ज किया।

निष्कर्ष : आंबेडकरवादी मूल्यांकन

आंबेडकरवादी दृष्टि से कांशीराम को न तो पूर्ण नायक के रूप में देखा जा सकता है और न ही केवल राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में। वे — 
• संगठन निर्माता थे
• चेतना निर्माता थे
• लेकिन वैचारिक सीमाओं से मुक्त नहीं थे।

उनका सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि उन्होंने बहुजन समाज को राजनीतिक आत्मविश्वास दिया। किंतु आंबेडकरवादी दृष्टि यह भी कहती है कि सत्ता नहीं — विचार सर्वोच्च होते हैं। आज आवश्यकता है कि कांशीराम के आंदोलन को आंबेडकर के मूल दर्शन — समता, करुणा, वैज्ञानिक चेतना और संवैधानिक नैतिकता से पुनः जोड़ा जाए।

- देवचंद्र भारती 'प्रखर' 
आंबेडकरवादी साहित्यकार एवं चिंतक 

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