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आलोचना और समालोचना : अंतर का प्रश्न या भाषाई तसल्ली?

हिंदी साहित्यिक संसार में आलोचना और समालोचना दो शब्द बहुत प्रचलित हैं। साहित्यिक लेखन में कई बार इन दोनों के बीच अंतर बताने की कोशिश की जाती है। कुछ लोग कहते हैं कि आलोचना सामान्य परीक्षण है और समालोचना संतुलित विवेचन है; कुछ इसे विश्लेषण और निर्णय का अंतर बताते हैं। लेकिन जब हिंदी साहित्य के वास्तविक व्यवहार को देखा जाता है, तो यह पूरा अंतर काफी हद तक भाषाई तसल्ली जैसा दिखाई देता है। साहित्यिक जीवन में दोनों शब्दों के बीच जो भारी अंतर खड़ा किया जाता है, वह व्यवहार में लगभग गायब है। आलोचना : अर्थ और अंग्रेज़ी शब्द आलोचना का अर्थ है—किसी साहित्यिक कृति का परीक्षण, विश्लेषण और मूल्यांकन। अंग्रेज़ी में इसके लिए सामान्य शब्द है—Criticism, अर्थात् किसी साहित्यिक कृति या विचार का विश्लेषण और मूल्यांकन। हिंदी साहित्य में यह शब्द पूरी तरह स्थापित है। इसलिए हम सहज रूप से कहते हैं—हिंदी आलोचना, साहित्यिक आलोचना, आधुनिक आलोचना और जो व्यक्ति यह कार्य करता है, उसे आलोचक कहा जाता है। समालोचना : अर्थ और अंग्रेज़ी शब्द समालोचना शब्द ‘सम् + आलोचना’ से बना है। इसका शाब्दिक अर्थ है—सम्यक या संतुलित आलोचन...

रामचरितमानस : एक ईमानदार साहित्यिक आलोचक की दृष्टि में

भारतीय साहित्य की परंपरा में कुछ ग्रंथ ऐसे हैं जो केवल “पुस्तक” नहीं रहते — वे समाज की चेतना का हिस्सा बन जाते हैं। रामचरितमानस ऐसा ही ग्रंथ है। इसे पढ़ना केवल काव्य पढ़ना नहीं, एक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संरचना से संवाद करना है। लेकिन प्रश्न यह है: क्या हम इसे केवल श्रद्धा से पढ़ेंगे, या आलोचनात्मक विवेक से भी? 1. काव्य-शक्ति: भाषा, लय और लोक-संवेदना सबसे पहले न्याय यही है कि इसकी काव्यात्मक उपलब्धि को स्वीकार किया जाए। तुलसीदास ने अवधी को जिस ऊँचाई पर पहुँचाया, वह अद्वितीय है। छंदों की प्रवाहशीलता, अलंकारों की सहजता और कथानक की क्रमबद्धता इसे अत्यंत प्रभावशाली बनाती है। यह ग्रंथ केवल पढ़ा नहीं जाता — गाया जाता है, स्मरण किया जाता है, जीया जाता है। यह उसकी सौंदर्य-शक्ति है। 2. आदर्श नायक की रचना — शक्ति या सीमा? मानस में राम एक आदर्श पुरुष हैं — मर्यादा, करुणा और धर्म के प्रतीक। लेकिन आधुनिक साहित्यिक दृष्टि पूछती है: क्या यह आदर्शीकरण पात्र को मनुष्य से देवत्व की ओर इतना उठा देता है कि उसकी मानवीय जटिलता धुँधली हो जाती है? यदि हम इसकी तुलना महाभारत से करें, वहाँ पात्र अधिक द्वंद्वग्रस्त ...

स्वाधीनता आंदोलन और खड़ी बोली हिंदी का साहित्य (शोध-पत्र)

स्वाधीनता आंदोलन और खड़ी बोली हिंदी का साहित्य - शोध-पत्र  (शोध-पत्र) स्वाधीनता आंदोलन और खड़ी बोली हिंदी का साहित्य लेखक - देवचंद्र भारती 'प्रखर' शोध सारांश  पराधीन भारत में ब्रिटिश शासन से मुक्ति पाने के लिए भारतीय साहित्यकारों ने स्वाधीनता आंदोलन में अपना साहित्यिक योगदान दिया । साहित्यकारों ने खड़ी बोली हिंदी में साहित्य-सृजन करके भारतीय जनता में जागृति और स्वदेश प्रेम का भाव उत्पन्न किया । कविता, कहानी, नाटक तथा उपन्यास आदि विधाओं के माध्यम से हिंदी साहित्यकारों ने स्वाधीनता आंदोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । अनेक साहित्यकारों ने साहित्य सृजन के अतिरिक्त स्वयं स्वाधीनता आंदोलन में प्रतिभाग भी किया तथा वे अंग्रेजी प्रशासन द्वारा बंदी भी बनाये गये, किंतु उन्होंने अपनी क्रांति की राह नहीं छोड़ी । हिंदी साहित्यकारों द्वारा निरंतर साहित्यिक प्रयास के कारण भारत के जवानों ने अंग्रेजी शासन का कड़ा विरोध किया तथा अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया ।  बीज शब्द  स्वाधीनता, खड़ी बोली, हिंदी साहित्य, राष्ट्रीय चेतना, स्वतंत्रता संघर्ष, सांस्कृति...

छठ धार्मिक पर्व नहीं, लोक पर्व है

छठ कोई धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि लोक पर्व है । छठ का बौद्ध धम्म से कोई संबंध नहीं है । सूर्यपूजा से भी छठ का कोई संबंध नहीं है । पानी में खड़े होकर अर्घ्य देना अंधविश्वास और पाखंड के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । - देवचंद्र भारती 'प्रखर'

भोजपुरी बिरहा ( संपूर्ण जानकारी )

भोजपुरी बिरहा के विषय में सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करने वाली पहली पुस्तक है - 'भोजपुरी बिरहा' 2013 । भोजपुरी बिरहा नाम की इस पुस्तक में बिरहा संबंधी अनेक प्रश्नों के उत्तर समाहित हैं । इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य बिरहा की आलोचना करना नहीं है बल्कि भोजपुरी कवियों का ध्यान उत्कृष्ट साहित्य की ओर आकृष्ट करना है । इस पुस्तक में 'बिरहा का उद्भव और विकास', 'बिरहा का नामकरण', 'बिरहा में अखाड़ेबाजी', 'बिरहा में जातिवाद', 'बिरहा का दंगल', 'बिरहा के अंग' और 'बिरहा का मूल्यांकन' आदि शीर्षकों के अंतर्गत मैंने मैं अपने विचारों को अभिव्यक्त किया है । चूँकि बिरहा भोजपुरी क्षेत्र की बहुचर्चित और श्रेष्ठ काव्य रचना के रूप में मान्य है, इसलिए एकाएक इसकी आलोचना करने से बिरहा प्रेमियों को अनुचित लगेगा । अतः बुद्धिजीवियों से मेरा अनुरोध है कि वे भावुकता त्यागकर बुद्धिपूर्वक अमल करेंगे । भोजपुरी बिरहा का उद्भव एवं विकास Bhojpuri Birha Ka Udbhav Evam Vikas सुनने को मिलता है कि भोजपुरी बिरहा की रचना करने का आरंभ सर्वप्रथम किसी बिहारी ( यह हिं...