'कॉकरोच आंदोलन' : दिशाहीन आंदोलन का दुष्परिणाम : एक वैचारिक समीक्षा

लोकतंत्र में आंदोलन जनता की आवाज़ होते हैं। इतिहास साक्षी है कि अनेक जनआंदोलनों ने समाज और शासन दोनों को नई दिशा दी है। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि हर आंदोलन स्वतः न्यायपूर्ण, दूरदर्शी या सफल नहीं होता। यदि किसी आंदोलन में स्पष्ट उद्देश्य, सही नेतृत्व, संस्थागत समझ और संवैधानिक रणनीति का अभाव हो, तो वह समाज को समाधान देने के बजाय भ्रम, विभाजन और निराशा की ओर भी ले जा सकता है। इसी संदर्भ में मैं जिस आंदोलन को "कॉकरोच आंदोलन" कह रहा हूँ, उसकी समीक्षा आवश्यक समझता हूँ। यह नाम मेरी आलोचनात्मक अभिव्यक्ति है; मेरा उद्देश्य किसी छात्र या नागरिक का अपमान करना नहीं, बल्कि आंदोलन की दिशा और कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाना है।

आंदोलन की पहली कसौटी : क्या समस्या की सही पहचान हुई?

किसी भी आंदोलन की सफलता का पहला आधार यह है कि वह समस्या की सही पहचान करे और सही संस्था से जवाबदेही माँगे। यदि किसी परीक्षा में अनियमितता होती है, तो यह देखना आवश्यक है कि परीक्षा का आयोजन किस संस्था ने किया, निर्णय किस स्तर पर हुए और प्रशासनिक उत्तरदायित्व किसका है। यदि आंदोलन अपनी पहली माँग ही उस व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध खड़ा कर दे जो प्रत्यक्ष प्रशासनिक उत्तरदायित्व नहीं निभाती, तो उसकी रणनीति प्रारंभ से ही कमजोर दिखाई देती है। लोकतंत्र में केवल विरोध पर्याप्त नहीं है; सही स्थान पर, सही प्रश्न और सही माँग भी उतनी ही आवश्यक है।

भावनाओं से नहीं, तथ्यों से आंदोलन चलते हैं

आज सोशल मीडिया के युग में किसी भी विषय पर कुछ घंटों में लाखों लोगों की भावनाएँ एक दिशा में मोड़ी जा सकती हैं। परंतु लोकतांत्रिक आंदोलन केवल भावनात्मक उभार से सफल नहीं होते। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संघर्ष का मार्ग दिखाया, लेकिन वह संघर्ष अध्ययन, संगठन, संवैधानिक अधिकार और तार्किक प्रतिरोध पर आधारित था। उन्होंने कभी भी भावनात्मक उन्माद को परिवर्तन का साधन नहीं माना। यदि किसी आंदोलन का आधार तथ्य कम और भावनात्मक अपील अधिक हो जाए, तो उसके भटकने की संभावना बढ़ जाती है।

दिशाहीन आंदोलन का सबसे बड़ा नुकसान युवाओं को होता है

किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी कीमत प्रायः युवा चुकाते हैं। जब आंदोलन स्पष्ट रणनीति के बिना आगे बढ़ता है, तो सड़क पर वही युवा उतरते हैं जिनके भविष्य का प्रश्न होता है। टकराव की स्थिति बनती है, कई स्थानों पर पुलिस कार्रवाई होती है, लाठीचार्ज, हिरासत या अन्य कानूनी परिणाम सामने आते हैं। अंततः सबसे अधिक मानसिक, शैक्षणिक और सामाजिक नुकसान उन्हीं युवाओं को झेलना पड़ता है, जिनके हितों के नाम पर आंदोलन किया गया था। यही कारण है कि आंदोलन शुरू करने से पहले उसके नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल भीड़ जुटाने की नहीं, बल्कि युवाओं की सुरक्षा, दिशा और भविष्य के प्रति भी होती है।

आज युवा बनाम युवा की स्थिति क्यों?

किसी भी आंदोलन की गंभीर परीक्षा तब होती है जब समाज का वही वर्ग, जिसके नाम पर आंदोलन चल रहा है, उसके भीतर मतभेद उत्पन्न होने लगें। आज अनेक युवा इस आंदोलन के समर्थन में हैं, वहीं बड़ी संख्या में युवा इसके विरोध में भी अपनी बात रख रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि एक पक्ष पूरी तरह सही और दूसरा पूरी तरह गलत है; बल्कि यह संकेत है कि आंदोलन अपने उद्देश्य और रणनीति को लेकर व्यापक सहमति बनाने में सफल नहीं हुआ। जब कोई आंदोलन अपने ही लक्षित वर्ग को विभाजित कर दे, तो नेतृत्व को आत्ममंथन करना चाहिए कि कहीं रणनीति, संवाद या दिशा में कमी तो नहीं रही।

केवल सोशल मीडिया का समर्थन पर्याप्त नहीं

आजकल अनेक लोग सोशल मीडिया पर किसी भी आंदोलन के समर्थन में लगातार पोस्ट लिखते हैं। किंतु लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता केवल डिजिटल पोस्ट से सिद्ध नहीं होती। यदि कोई व्यक्ति वास्तव में किसी आंदोलन को न्यायसंगत मानता है, तो उसे यह भी विचार करना चाहिए कि क्या वह अपने परिवार के युवाओं को भी उसी आंदोलन में भाग लेने की सलाह देगा। यह प्रश्न किसी की निष्ठा पर आक्षेप लगाने के लिए नहीं, बल्कि समर्थन की वास्तविकता को परखने के लिए है। सोशल मीडिया पर समर्थन देना आसान है; आंदोलन की वास्तविक जिम्मेदारी उठाना कहीं अधिक कठिन है।

नेतृत्व की योग्यता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है

किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन उसके नेतृत्व से होता है। यदि आंदोलन के दौरान बार-बार रणनीति बदलती रहे, माँगें अस्पष्ट रहें, जवाबदेही का केंद्र बदलता रहे और अंततः कोई ठोस उपलब्धि सामने न आए, तो स्वाभाविक है कि नेतृत्व की क्षमता पर प्रश्न उठेंगे। लोकतंत्र में किसी भी आंदोलन का नेतृत्व आलोचना से ऊपर नहीं होता। जिस प्रकार सरकार से जवाबदेही माँगी जाती है, उसी प्रकार आंदोलन के नेतृत्व से भी पूछा जाना चाहिए कि उसकी रणनीति क्या थी, उपलब्धियाँ क्या रहीं और जिन युवाओं ने उस पर विश्वास किया, उन्हें क्या परिणाम मिला।

अनशन और उसका अंत

हाल के घटनाक्रम में आंदोलन से जुड़े प्रमुख चेहरों में से एक सोनम वांगचुक ने अपना अनशन समाप्त कर दिया। उन्होंने यह निर्णय सरकार से संवाद और आगे की प्रक्रिया को अवसर देने के संदर्भ में लिया। यह घटना हमें एक महत्वपूर्ण तथ्य याद दिलाती है—कोई भी आंदोलन अंततः संवाद, संवैधानिक प्रक्रिया और व्यावहारिक समाधान की ओर ही बढ़ता है। आंदोलन स्वयं अंतिम लक्ष्य नहीं होता; वह समाधान तक पहुँचने का माध्यम होता है।

आंदोलन और आंबेडकरवादी दृष्टि

आंबेडकरवादी दृष्टि में संघर्ष का अर्थ अराजकता नहीं, बल्कि शिक्षित, संगठित और संवैधानिक संघर्ष है। यदि कोई आंदोलन अध्ययन से दूर हो, तथ्यों से कमजोर हो, संस्थागत उत्तरदायित्व की स्पष्ट समझ न रखता हो और भावनाओं को तर्क से ऊपर रखे, तो वह आंबेडकरवादी दृष्टि से आदर्श आंदोलन नहीं माना जा सकता। डॉ. आंबेडकर ने संघर्ष को ज्ञान, संगठन और विधिसम्मत परिवर्तन का माध्यम बनाया। यही लोकतांत्रिक आंदोलन की वास्तविक दिशा भी होनी चाहिए।

निष्कर्ष

किसी भी लोकतांत्रिक समाज को आंदोलनों की आवश्यकता होती है, परंतु उससे भी अधिक आवश्यकता विवेकपूर्ण आंदोलनों की होती है। भावनात्मक उत्तेजना से भीड़ तो एकत्र की जा सकती है, किंतु समाज का स्थायी परिवर्तन नहीं किया जा सकता। इसके लिए तथ्य, अध्ययन, संगठन, स्पष्ट नेतृत्व, सही जवाबदेही और संवैधानिक रणनीति आवश्यक है। यदि कोई आंदोलन इन आधारों से दूर चला जाता है, तो उसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम समाज और विशेषकर युवाओं को भुगतना पड़ता है। तब आंदोलन अपने घोषित उद्देश्य से भटककर स्वयं विवाद का विषय बन जाता है। इसलिए मेरा आग्रह किसी आंदोलन के विरोध या समर्थन से अधिक उसके विवेकपूर्ण मूल्यांकन का है। लोकतंत्र में आंदोलन का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है यह प्रश्न पूछना कि क्या आंदोलन सही दिशा में चल रहा है, क्या उसकी माँगें तथ्यपरक हैं, क्या उसका नेतृत्व उत्तरदायी है और क्या उससे समाज को वास्तविक समाधान मिल रहा है?

किसी भी आंदोलन की विश्वसनीयता इस बात से तय होती है कि वह सही संस्था से जवाबदेही माँगे, सही रणनीति अपनाए और जिन युवाओं के भविष्य की बात करता है, उनके हितों की वास्तविक रक्षा भी करे। यही लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व है, यही संवैधानिक मर्यादा है और यही किसी भी जनआंदोलन की वास्तविक कसौटी है।

— देवचंद्र भारती 'प्रखर'

आंबेडकरवादी चिंतक एवं आलोचक

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