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'कॉकरोच आंदोलन' : दिशाहीन आंदोलन का दुष्परिणाम : एक वैचारिक समीक्षा

लोकतंत्र में आंदोलन जनता की आवाज़ होते हैं। इतिहास साक्षी है कि अनेक जनआंदोलनों ने समाज और शासन दोनों को नई दिशा दी है। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि हर आंदोलन स्वतः न्यायपूर्ण, दूरदर्शी या सफल नहीं होता। यदि किसी आंदोलन में स्पष्ट उद्देश्य, सही नेतृत्व, संस्थागत समझ और संवैधानिक रणनीति का अभाव हो, तो वह समाज को समाधान देने के बजाय भ्रम, विभाजन और निराशा की ओर भी ले जा सकता है। इसी संदर्भ में मैं जिस आंदोलन को "कॉकरोच आंदोलन" कह रहा हूँ, उसकी समीक्षा आवश्यक समझता हूँ। यह नाम मेरी आलोचनात्मक अभिव्यक्ति है; मेरा उद्देश्य किसी छात्र या नागरिक का अपमान करना नहीं, बल्कि आंदोलन की दिशा और कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाना है। आंदोलन की पहली कसौटी : क्या समस्या की सही पहचान हुई? किसी भी आंदोलन की सफलता का पहला आधार यह है कि वह समस्या की सही पहचान करे और सही संस्था से जवाबदेही माँगे। यदि किसी परीक्षा में अनियमितता होती है, तो यह देखना आवश्यक है कि परीक्षा का आयोजन किस संस्था ने किया, निर्णय किस स्तर पर हुए और प्रशासनिक उत्तरदायित्व किसका है। यदि आंदोलन अपनी पहली माँग ही उस व्यक्ति या संस...