गुरु रविदास पचासा : समता, श्रम और मानव-गरिमा के संत कवि को काव्यात्मक श्रद्धांजलि

भारतीय संत परंपरा में गुरु रविदास एक ऐसे क्रांतिकारी संत कवि हैं, जिनकी वाणी भक्ति के साथ-साथ सामाजिक समानता और मानव-गरिमा की सशक्त घोषणा करती है। उन्होंने कर्म, श्रम और सदाचार को ही सच्चा धर्म मानते हुए जाति, कुल और ऊँच-नीच की संकीर्ण दीवारों को अस्वीकार किया।

'गुरु रविदास पचासा' उसी वैचारिक परंपरा का काव्यात्मक विस्तार है, जिसमें गुरु रविदास के जीवन-दर्शन, सामाजिक दृष्टि और मानवीय मूल्यों को पचास छंदों में रूपायित किया गया है। इसके साथ प्रस्तुत रविदास वंदना श्रद्धा का स्वर है, जबकि कीर्ति दशक गुरु रविदास की ऐतिहासिक और वैचारिक महत्ता को संक्षेप में रेखांकित करता है। यह रचना न केवल प्रशस्ति-काव्य है, बल्कि सामाजिक चेतना का भी सशक्त साहित्यिक दस्तावेज है। 

गुरु रविदास-वंदना में मानव छंद का प्रयोग किया गया है। गुरु रविदास पचासा में परंपरागत दोहा-चौपाई छंद है।

गुरु रविदास वंदना 
[मानव छंद में गुरु रविदास जी की स्तुति]  

शांत करें मन का संत्रास।
संत शिरोमणि गुरु रविदास।१।

मन ही पूजा मन ही धूप।
मन ही देखे सहज स्वरूप।।
शीघ्र बनाते मन को दास।
संत शिरोमणि गुरु रविदास।२।

बेगमपुर में हो आवास।
घर-घर हो समता का वास।।
भ्रमित चित्त में भरें प्रकाश। 
संत शिरोमणि गुरु रविदास।३।

प्रज्ञा से पूरित हैं आप। 
करुणा से हरते संताप।।
करें शील से दुःख का नाश।
संत शिरोमणि गुरु रविदास।४।

जन-जन में हो मैत्री भाव।
'प्रखर' सत्य का रहे प्रभाव।।
न्याय भावना करे विकास।
संत शिरोमणि गुरु रविदास।५।


गुरु रविदास पचासा 
[दोहा-चौपाई छंद में गुरु रविदास जी का महिमा गान]  

।। दोहा छंद ।।
सतगुरु के सत्ज्ञान से, कुंठित मति गतिशील ।
मन की माया शून्य हो, काया बने सुशील ।१।
संत शिरोमणि नाम है, धाम अमल अविकार ।
महिमा गुरु रविदास की, अमित अनूप अपार ।२।

।। चौपाई छंद ।।
जय रविदास आस के दानी ।
जय गुरुवर जय हो वरदानी ।१।
हे दीनों के सच्चे दाता ।
तुमसे यह जीवन सुख पाता ।२।

जब चौदहवीं सदी उदासी ।
तुम बालक बन आये काशी ।३।
माघ महीने की पुनवासी ।
झूम उठे काशी के वासी ।४।

रघुनंदन कर्मा के लाला ।
मंडुवाडी में बचपन पाला ।५।
सीरकरहियाँ धाम तुम्हारा ।
सुखदायक है नाम तुम्हारा ।६।

संत शिखर तुमने मन साधा ।
अपनी इच्छाओं को बाँधा ।७।
ढोंगी सब तुमको उलझाये ।
तुम उनकी उलझन सुलझाये ।८।

राजा वीर सिंह हरसाया ।
जब तुमसे हर उत्तर पाया ।९।
तुमने उसका भरम मिटाया ।
वेदों का हर भेद बताया ।१०।

नीच किसी की जाति नहीं है ।
झूठे ने यह बात कही है ।११।
चर्चित है तुम्हारी बानी ।
पंडित वह है जो है ज्ञानी ।१२।

क्या है तिलक जनेऊ पोथी ।
शील बिना सब चीजें थोथी ।१३।
सच में पंडितराज तुम्हीं हो ।
गुरुओं के सिरताज तुम्हीं हो ।१४।

बिंदु मिले तो बनती रेखा ।
अंधेरे में किसने देखा ।१५।
यज्ञ हवन से क्या होता है ।
चारों ओर धुआँ होता है ।१६।

कथन तुम्हारा सिद्ध सही है ।
वचन अभी प्रसिद्ध वही है ।१७।
सूखा सुमन नहीं खिलता है ।
घी जलता तो जी जलता है ।१८।

संगम पर लगता है मेला ।
अमृत पाने का है खेला ।१९।
कुंभकथा है बहुत पुरानी ।
लोगों की जानी पहचानी ।२०।

लेकिन तुमने कहा निरंतर ।
यह तो है केवल आडंबर ।२१।
बूँद गिरी थी अगर सुधा की ।
तो अब है माटी वसुधा की ।२२।

संत कबीर लहरतारा में ।
नामी निर्गुण की धारा में ।२३।
वाद विवाद हुआ तब जाने ।
संत शिरोमणि तुमको माने ।२४।

आस्तिक सगुण और निर्गुण हैं ।
नास्तिक जैसा तुममें गुण है ।२५।
ईश्वर शब्द भरम की छाया ।
जग सच्चा है ईश्वर माया ।२६।

भारत में था मुस्लिम शासन ।
दिल्ली पर लोदी का आसन ।२७।
जहाँपनाह सिकंदर लोदी ।
इस्लामी था सगुण विरोधी ।२८।

दासों ने जब खबर सुनाया ।
लोदी अपना होश गँवाया ।२९।
जब तुमने उसको समझाया ।
तब वह अपना शीश झुकाया ।३०।

संत अनोखे थे गुरु नानक ।
काशी में आ गये अचानक ।३१।
भेंट हुई तुमसे तो बोले ।
खुलकर मन की बातें खोले ।३२।

पश्चिम-पूरब अंत मिले थे ।
जिस दिन दोनों संत मिले थे ।३३।
तुमने उनको ऐसा जीता ।
भूल गये वह भगवत गीता ।३४।

किनाराम नाम से नागा ।
तुमसे बाँधे मन का धागा ।३५।
चंचल मन के छंद तुम्हीं हो ।
सच में परमानंद तुम्हीं हो ।३६।

सूर रहीम बिहारी क्या हैं ।
तुम हीरा हो सब ताँबा हैं ।३७।
तुलसी हैं कवियों में नामी ।
तुम कवियों के सच्चे स्वामी ।३८।

राणा सांगा राजस्थानी ।
झाली बाई उसकी रानी ।३९।
नाम तुम्हारा सुनकर आई ।
तुमको भी चित्तौड़ बुलाई ।४०।

उसके आदर की परछाईं ।
पुत्रवधू थी मीराबाई ।४१।
मीरा ने जब तुमको जाना ।
उसने तुमको गुरुवर माना ।४२।

आंबेडकर जब परिचय पाये ।
प्रथम जयंती वह मनवाये ।४३।
बहुजन अब भी रीत निभाएँ ।
जन्म दिवस हर साल मनाएँ ।४४।

हिंदू सिक्ख बौद्ध जन सारे ।
बोलें तुम्हारे जयकारे ।४५।
जीवन-चरित विचित्र तुम्हारा ।
घर - घर में है चित्र तुम्हारा ।४६।

राह तुम्हारी जो भी आए ।
राहें जीवन की वह पाए ।४७।
जो भी तुम पर ध्यान लगाए ।
उसका ध्यान विमल हो जाए ।४८।

जो पढ़ता रविदास पचासा ।
उसके मन से मिटे निराशा ।४९।
गुरु कीर्तन 'प्रखर' को प्यारा ।
अमर रहे गुरु प्रेम हमारा ।५०।

।। दोहा छंद ।। 
मन चंगा ये हो गया, और नहीं कुछ आस ।
पत्नी जननी तात सहित, हृदय बसें रविदास ।१।



रविदास कीर्ति-दशक 

जन्म हुआ जिस रोज धरा पर, अंबर ने तब रूप संवारा।
आंचल में जब चांद खिला तब, श्वेत हुआ हर लाल सितारा।।
हाल बड़ा खुशहाल हुआ हर, मानव ने वह तेज निहारा।
आज यही दुनिया कहती गुरु, संत शिरोमणि नाम तुम्हारा।।

यौवन से भरपूर रही वह, सुंदर यौवन की रसधारा।
नैन मिलाकर चैन दिये तुम, मोह विहीन विचार तुम्हारा।।
हार गयी हर कामपरी जब, भी तुमने मन जोड़ निहारा।
आज यही दुनिया कहती गुरु, संत शिरोमणि नाम तुम्हारा।।

जाति बखान किये जब ब्राह्मण, नीच रखे जब नाम तुम्हारा।
अर्थ अनर्थ किये जब मानव, व्यर्थ हुआ जब दर्शन सारा।।
सिद्ध किया तुमने सच को तब, कुंठित चिंतक चित्त सुधारा।
आज यही दुनिया कहती गुरु, संत शिरोमणि नाम तुम्हारा।।

संत कबीर बड़े मनभावन, पावन ज्ञान स्वरूप सितारा।
वाद-विवाद हुआ तुमसे तब, ध्यान लगाकर हृदय हारा।।
संत महान कहे तुमको वह, लोक तुम्हारा पांव पखारा।
आज यही दुनिया कहती गुरु, संत शिरोमणि नाम तुम्हारा।।

लोग अछूत रहे दुःख में जब, डूब गया हर ओर किनारा।
धीरज संयम से तुमने तब, हृदय का हर भाव निखारा।।
बुद्धि विवेक विचार जगाकर, दूर किये मन का अंधियारा।
आज यही दुनिया कहती गुरु, संत शिरोमणि नाम तुम्हारा।।

शील विहीन समाज हुआ जब, लाज विहीन हुआ दुखियारा।
लोचन में करुणा भरके तुम, दान किये गुण का उजियारा।।
त्याग तपोमय कीर्ति हुई तब, गूंज उठा जग में जयकारा।
आज यही दुनिया कहती गुरु, संत शिरोमणि नाम तुम्हारा।।

धर्म हुआ जब घोर अनैतिक, ढोंग हुआ जब धार्मिक नारा।
ग्रंथ किये गुणगान अलौकिक, लौकिक लोक हुआ तब खारा।।
सम्यक धम्म किये तुम धारण, जीत गया तब सत्य दुबारा।
आज यही दुनिया कहती गुरु, संत शिरोमणि नाम तुम्हारा।।

काव्य विधा जब कर्म बनी तब, नाम पड़ा कृतिकार तुम्हारा।
भावुकता तुमने ठुकराकर, बौद्धिक तार्किक शब्द उचारा।।
वैदिक खंडन रोज किये गुरु, पा करके तुम निर्गुण धारा।।
आज यही दुनिया कहती गुरु, संत शिरोमणि नाम तुम्हारा।।

जीवनदीप जला जब से यह, चेतन रूप बना दुखियारा।
तंग हुआ जब जीव सदा तब, शोध किया हर रोज विचारा।।
मीट बना सुख जीवन का अब, छंद करे गुरु का जयकारा।
आज यही दुनिया कहती गुरु, संत शिरोमणि नाम तुम्हारा।।

शोधक शोध किये जब भी तब, शुद्ध मिला इतिहास तुम्हारा।
बुद्ध स्वरूप दिखा तुममें नित, बौद्ध विरासत का गुण प्यारा।।
'प्रखर' जान गये तुमको अब, तेज हुई यह जीवन धारा।
आज यही दुनिया कहती गुरु, संत शिरोमणि नाम तुम्हारा।।
(मत्तगयंद सवैया छंद)

🔚 निष्कर्ष (Conclusion)
गुरु रविदास की वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी उनके समय में थी। उनकी कल्पित बेगमपुरा केवल एक आध्यात्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि जाति-विहीन, शोषण-मुक्त और समतामूलक समाज का स्वप्न है।

गुरु रविदास पचासा, रविदास वंदना और कीर्ति दशक के माध्यम से यह रचना संत रविदास के उसी स्वप्न, संघर्ष और दर्शन को काव्यात्मक स्वर प्रदान करती है। यह पाठ पाठकों को आत्ममंथन के साथ-साथ सामाजिक न्याय, मानवता और श्रम-सम्मान की ओर प्रेरित करता है। संत रविदास की वैचारिक विरासत को समझने और आगे बढ़ाने की दिशा में यह एक विनम्र साहित्यिक प्रयास है।

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