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संत काव्य परंपरा और संत रविदास का काव्य

निर्गुणमार्गी संत-काव्य भक्तिकालीन हिन्दी साहित्य का आरंभिक अंश है । आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने नामदेव एवं कबीर द्वारा प्रवर्तित भक्ति धारा को 'निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा' की संज्ञा से अभिहित किया है । डाॅ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे 'निर्गुण भक्ति साहित्य' तथा डाॅ० रामकुमार वर्मा ने इसे 'संत काव्य परंपरा' का नाम दिया है । 'संत' शब्द की व्युत्पत्ति और परिभाषा  (1) पाणिनीय अष्टाध्यायी सूत्र 'कंशम्यां वभयुस्तितुचसः' के अनुसार 'शम्' शब्द 'त' प्रत्यय से संयुक्त होकर 'शान्त' बन जाता है । इसी का अपभ्रंश 'संत' शब्द है । (2) 'सत्' शब्द का प्रथमा विभक्ति के बहुवचन में 'संतः' रूप बनता है । उसी का अपभ्रंश 'संत' शब्द सत्पुरुषों के लिए हिन्दी में प्रयुक्त होता है । (3) वैदिक निघण्टु में 'सन्' शब्द जल का भी पर्याय माना गया है । वहाँ पर टीकाकार ने 'सन्' का अर्थ लिखा है, 'सर्वदा विद्यमान प्रलयेऽपि नाशाभावात्' । प्रलय काल में भी जल का अभाव नहीं होता । ध्यान देने पर यह स्पष्ट हो जा...

भोजपुरी बिरहा ( संपूर्ण जानकारी )

भोजपुरी बिरहा के विषय में सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करने वाली पहली पुस्तक है - 'भोजपुरी बिरहा' 2013 । भोजपुरी बिरहा नाम की इस पुस्तक में बिरहा संबंधी अनेक प्रश्नों के उत्तर समाहित हैं । इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य बिरहा की आलोचना करना नहीं है बल्कि भोजपुरी कवियों का ध्यान उत्कृष्ट साहित्य की ओर आकृष्ट करना है । इस पुस्तक में 'बिरहा का उद्भव और विकास', 'बिरहा का नामकरण', 'बिरहा में अखाड़ेबाजी', 'बिरहा में जातिवाद', 'बिरहा का दंगल', 'बिरहा के अंग' और 'बिरहा का मूल्यांकन' आदि शीर्षकों के अंतर्गत मैंने मैं अपने विचारों को अभिव्यक्त किया है । चूँकि बिरहा भोजपुरी क्षेत्र की बहुचर्चित और श्रेष्ठ काव्य रचना के रूप में मान्य है, इसलिए एकाएक इसकी आलोचना करने से बिरहा प्रेमियों को अनुचित लगेगा । अतः बुद्धिजीवियों से मेरा अनुरोध है कि वे भावुकता त्यागकर बुद्धिपूर्वक अमल करेंगे । भोजपुरी बिरहा का उद्भव एवं विकास Bhojpuri Birha Ka Udbhav Evam Vikas सुनने को मिलता है कि भोजपुरी बिरहा की रचना करने का आरंभ सर्वप्रथम किसी बिहारी ( यह हिं...

छंद परिचय और छंद नियम (हिंदी साहित्य)

हिंदी में छंद दो प्रकार के हैं -  मात्रिक छंद   और वार्णिक छंद ।  मात्रिक छंद में मात्राओं की गणना की जाती है तथा वार्णिक छंद में वर्णों की गणना की जाती है । मात्राएँ दो प्रकार की होती हैं - लघु मात्रा और दीर्घ मात्रा ।  >>  लघु मात्रा :  लघु मात्रा में एक मात्रा होती है । जिसका संकेत अंग्रेजी का 'आई' अक्षर (I) है ।  हिंदी वर्णमाला की सभी ह्रस्व स्वरों में लघु मात्रा होती है । जैसे - अ, इ, उ आदि । >>  दीर्घ मात्रा :  दीर्घ मात्रा में दो मात्रा होती है । दीर्घ  मात्रा को 'गुरु मात्रा' भी कहते हैं, जिसका संकेत अंग्रेजी का 'एस' अक्षर (S) है । हिंदी वर्णमाला की सभी दीर्घ स्वरों और संयुक्ताक्षरों में लघु मात्रा होती है । जैसे - आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः, क्ष, त्र, ज्ञ आदि । >>  गण :   गण का अर्थ समूह है । तीन अक्षरों को मिलाकर एक गण (समूह) बनता है । भारतीय विद्वानों द्वारा आठ गण निर्धारित किये गये हैं । गणों को याद करने के लिए निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है - सूत्र :   यमाताराजभानसरगा ...

अरी वरुणा की शांत कछार - जयशंकर प्रसाद

छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कविता 'अरी वरुणा की शांत कछार !' तथागत गौतम बुद्ध को समर्पित है । वह कविता अवलोकन हेतु प्रस्तुत है । अरी, वरुणा की शांत कछार !  (बुद्ध को समर्पित कविता) Aree, Varuna Ki Shant Kachhar / Jayshankar Prasad  अरी वरुणा की शांत कछार ! तपस्वी के विराग की प्यार ! सतत  व्याकुलता के विश्राम,  अरे ऋषियों के कानन-कुंज ! जगत नश्वरता से लघु प्राण,  लता, पादप, सुमनों के पुंज ! तुम्हारी कुटियों में चुपचाप,  चल रहा था उज्जवल व्यापार । स्वर्ग की वसुधा से शुचि संधि,  गूंजता था जिससे संसार । अरी वरुणा की शांत कछार ! तपस्वी के विराग की प्यार ! तुम्हारे  कुंजों में तल्लीन,  दर्शनों के होते थे वाद । देवताओं के प्रादुर्भाव,  स्वर्ग के सपनों के संवाद । स्निग्ध तरु की छाया में बैठ,  परिषदें करती थीं सुविचार । भाग कितना लेगा मस्तिष्क,  हृदय का कितना है अधिकार ? अरी वरुणा की शांत कछार ! तपस्वी के विराग की प्यार ! छोड़कर  पार्थिव भोग विभूति,  प्रेयसी का दुर्लभ वह प्यार । पिता का वचन भरा वात्सल्य,  पुत...

दलित जागरण (कविता संग्रह)

समर्पण  -  दलित समाज को समता और स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करने वाले, आधुनिक भारत के निर्माता बाबा साहेब डॉ० भीमराव अंबेडकर जी को समर्पित । अभिमत -  दोहा, चौपाई तथा छोटी-छोटी तुकबंदियों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि यदि थोड़ा सा भी ध्यान देकर सुना या पढ़ा जाए, तो ये क्षण-मात्र में बड़ी सरलता से कंठस्थ हो जाते हैं । मनोरंजक खेल अंत्याक्षरी में तो ये बड़े काम के होते हैं । साहित्य की यह विधा यत्र - तत्र बिखरी पड़ी है । प्राचीन काल, मध्यकाल, आधुनिक काल के कवियों और महापुरुषों की रचनाएँ, इस विधा में समाज को मिलती रही हैं । इसका अभाव वर्तमान में दिख रहा है । संत समाज में यह विधा वाणी के रूप में है और अध्यात्म जगत के लिए यह अमृत रस है । सामान्य जीवन में क्षण - प्रतिक्षण उद्घाटित होने वाले शब्द क्षणगेयता की छोटी-छोटी पंक्तियों में बंधकर रचना का रूप धारण कर लेते हैं । देवचंद्र भारती 'प्रखर' ने संसाधन विहीन ग्रामीण परिवेश में रहते हुए जो अनुभूति की, उसे ही कलमबद्ध भी किया । स्थानीय बोली में शब्दों का प्रयोग बड़ी ही पटुता के साथ किया है, जिसका पुट इनके दोहों और छंदों में ...