दीपदान-उत्सव के नाम पर अंधभक्ति (आंबेडकरवादी कविता)
दीपदान, जिसे पारंपरिक रूप से एक धाम्मिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, प्रायः लोगों की अंधश्रद्धा और भ्रम का कारण बन जाता है। महायान की अनेक प्रथाओं में यह देखा गया है कि वास्तविक बुद्ध-धम्म के संदेश को भूलकर केवल अंधविश्वास और पाखंड का अनुपालन किया जाता है।
इस ब्लॉग में प्रस्तुत आंबेडकरवादी कविता के माध्यम से कवि ने महायान की इस भ्रमपूर्ण उत्सव दीपदान की वास्तविकता को व्यक्त किया है। कवि के अनुसार, 'दीपदान' और 'दीपावली' में कोई अंतर नहीं दिखाई देता है।
दीपदान-उत्सव के नाम पर अंधभक्ति
(आंबेडकरवादी कविता)
महायान वाले हैं बातें बनाते।
'दीपदान' कहकर दीवाली मनाते।।
शुद्ध धम्म बुद्ध का समझ ही न पाये।
करके अशुद्ध धम्म को, खिलखिलाते।।
नकली हैं, करते नकल दूसरों की।
नाम अलग, काम एक जैसा दिखाते।।
उनके ही जैसे ये भी पूजा करते।
बुद्ध-मूर्ति को फल-मिठाई चढ़ाते।।
बुद्ध-धम्म विज्ञान का अनुगमन है।
ये अंधभक्ति में सब भूल जाते।।
हीनयान को हीन हैं ये समझते।
ये धम्म-राही को हैं भटकाते।।
'प्रखर' नक्कालों से रहना संभलकर।
करके कुतर्क भीड़ हैं ये जमाते।।
[ रचना तिथि : 19/10/2025 ]
निष्कर्ष:
दीपदान की परंपरा को केवल उत्सव के रूप में मनाना प्रायः लोगों को अंधभक्ति और भ्रम की ओर ले जाता है। महायान की अनेक प्रथाएं, चाहे भली-भांति धाम्मिक प्रतीत हों, वास्तविक बुद्ध-धम्म के संदेश को कहीं खो देती हैं। इस कविता के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि विज्ञान का अनुसरण करना और अंधश्रद्धा से बचना ही असली बुद्ध-धम्म की पहचान है।
अंततः, दीपावली के समान दीपदान-उत्सव का आनंद लेने की बजाय धम्म की वास्तविकता को समझना और आत्मनिरीक्षण करना आवश्यक है। क्योंकि 'दीपदान' उत्सव नहीं, चेतना है।
✍️ कवि - देवचंद्र भारती 'प्रखर'
(आंबेडकरवादी साहित्यकार एवं चिंतक)
👉 अगर यह लेख आपको विचारोत्तेजक लगा हो, तो इसे साझा करें।
👉 विषय से संबंधित गंभीर टिप्पणी ही करें।