कटु यथार्थ (पुरुष-विमर्श की कविता)
समकालीन विमर्श में सामाजिक विफलताओं का सारा बोझ अक्सर एक ही पक्ष पर डाल दिया जाता है। 'पुरुष-सुधार' की भाषा में कही जाने वाली अनेक बातें चयनात्मक यथार्थ पर आधारित होती हैं, जहाँ आत्मालोचना की जगह आरोप-प्रत्यारोप ले लेते हैं। यह कविता उसी एकांगी दृष्टि पर प्रश्न उठाती है।
'कटु यथार्थ' कविता 'विषमता के विरुद्ध' नामक पुस्तक में संग्रहीत है। यह कविता किसी वर्ग के प्रति घृणा नहीं, बल्कि रिश्तों, अपेक्षाओं और व्यवहार में मौजूद दोहरे मानदंडों की ओर संकेत है। यह रचना पाठक को असहज करती है, ताकि वह अपने-अपने पक्ष की जिम्मेदारियों पर भी विचार करें—क्योंकि सामाजिक सुधार एकतरफा नहीं, साझा प्रयास से ही संभव है।
कटु यथार्थ
(नारी-विमर्श एवं पुरुष-विमर्श की कविता)
हम पुरुषों को सुधारने में
ऊर्जा नहीं खपाओ ।
ऐ महिलाओं! कब सुधरोगी
पहले तुम बतलाओ ।।
कटु यथार्थ है, हम पुरुषों ने
कुलटा को भी चाहा ।
मार-पीटकर भी उसके ही
संग जीवन को निबाहा ।।
📝 नारी-विमर्श पर आधारित देवचंद्र भारती 'प्रखर' की एक अन्य कविता 👉 'नारीवाद की पों-पों' को भी पढ़ें।
पढ़ी-लिखी तुम सब महिलाएँ
अहंकार करती हो ।
पैसे और नौकरीवालों से ही
प्यार करती हो ।।
बेरोजगार युवाओं से
कितनों ने की है शादी ?
पहले इसका जवाब दो
फिर बनना यथार्थवादी ।।
निष्कर्ष
सामाजिक यथार्थ कड़वा हो सकता है, लेकिन उससे मुँह मोड़ना समाधान नहीं। यदि हम केवल दूसरों को सुधारने की बात करें और स्वयं की भूमिका पर प्रश्न न उठाएँ, तो कोई भी आंदोलन खोखला रह जाता है। यह कविता पुरुष-विरोध या स्त्री-विरोध नहीं, बल्कि आत्ममंथन का आग्रह है। समानता, सम्मान और साझेदारी—इन्हीं से रिश्ते और समाज दोनों मजबूत होते हैं।
✍️ लेखक - देवचंद्र भारती 'प्रखर'
(आंबेडकरवादी साहित्यकार एवं चिंतक)
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