बाल-सजल और रघुबीर सिंह ‘नाहर’ : एक साहित्यिक मूल्यांकन
इसी काव्य-विधा के भीतर ‘बाल-सजल’ का प्रयोग एक महत्वपूर्ण साहित्यिक नवाचार है, और हिंदी में इस दिशा में पहला ठोस सृजन कवि रघुवीर सिंह ‘नाहर’ द्वारा सामने आता है। नाहर के बाल-सजल बाल-मन की सहजता, चंचलता और सामाजिक यथार्थ—तीनों को एक साथ साधते हैं।
1. विषय-वस्तु की विशेषता
बाल-सजल-1 से 4 तक में बाल्यावस्था का उल्लास, ग्राम्य जीवन, खेल-कूद, प्रकृति, पशु-पक्षी और सामूहिकता की भावना प्रमुख है।
नानी का गाँव, गिल्ली-डंडा, तोता, बुलबुल, चिड़ियाँ, पतंग, गुब्बारे, झुंझुना - ये सभी बिंब बाल-साहित्य की परंपरा से जुड़े हुए हैं, किंतु सजल की संरचना इन्हें आधुनिक काव्य-अनुशासन प्रदान करती है।
2. बाल-सजल-5 : सामाजिक हस्तक्षेप
पाँचवाँ बाल-सजल विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि यह बाल-मन की दृष्टि से पारिवारिक विघटन, संवाद-हीनता और मद्यपान जैसे गंभीर सामाजिक विषयों को उठाता है। यहाँ बाल-सजल केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संवेदनशील सामाजिक चेतना का माध्यम बन जाता है—
“मात-पिता के बीच में, बंद हुआ संवाद।”
यह पंक्ति बाल-साहित्य की सीमाओं को तोड़कर उसे सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ती है।
3. भाषा और शिल्प
भाषा सरल, संवादात्मक और बालोपयोगी है। तुकांतता स्वाभाविक है, कृत्रिम नहीं। कहीं-कहीं स्थानीय शब्दावली बाल-सजल को जीवंत बनाती है। ‘नाहर’ जी का आत्मसंकेत अंतिम पंक्तियों में नीतिक या भावात्मक निष्कर्ष के रूप में आता है, जो सजल के नियमों के अनुरूप है।
4. साहित्यिक महत्व
रघुवीर सिंह ‘नाहर’ के बाल-सजल - बाल-साहित्य को नई विधागत पहचान देते हैं, सजल को प्रयोग से आगे बढ़ाकर परंपरा की ओर ले जाते हैं और यह सिद्ध करते हैं कि नवीन काव्य-विधाएँ भी सामाजिक-शैक्षिक दायित्व निभा सकती हैं।
हिंदी में बाल-सजल की रचना करने वाले पहले कवि हैं - रघुवीर सिंह 'नाहर' । उनके द्वारा रचित कुछ बाल-सजलें यहां प्रस्तुत हैं ।
बाल सजल- १
गर्मी की छुट्टी हुई, चल नानी के गांव।
सोनू भी तैयार है, उठने लग गये पांव।।
गये घूमने बाग में, है बच्चों की रेल।
सीटी देती चल रही, पल-पल बढ़ता चाव।।
छोटा भाई चुलबला, करता नटखट खेल।
बिल्ली को ले साथ में, चढ़ जाता है नांव।।
आया चूहा पास में, तोड़ ले गया दांत।
सोनू रोने लग गया, है यह कैसा घाव।।
आये बच्चे गांव के, बढ़ा रहे हैं मेल।
चोर-सिपाही बन रहे, चला रहे हैं दांव।।
तोता बैठा डाल पर, करता मन की बात।
बारम्बार बुला रहा, पेड़ों वाली छांव।।
गिल्ली-डंडा हाथ में, आ जाते मैदान।
बचपन नाहर छिन गया, झलक रहे हैं भाव।।
(०७/०९/२०२४)
बाल सजल- २
सूरज ढ़लने लग रहा, बंद हुए सब हाट।।
शीघ्र घर पहुंचे नहीं, आज पड़ेगी डांट।।
दूर घरों से आ गये, मौसम हुआ खराब।
चलना भी दुश्वार है, टेढ़े-मेढ़े बांट।।
हैं कंटीली झाड़ियां, हम बच्चे नादान।
कौन बचाएगा हमें, सुनें नहीं आहट।।
संगी-साथी देखकर, हाथ पतंग की डोर।
झूम-झूम नाचें सभी, आ सरिता के पाट।।
गुब्बारे लेकर खड़ा, हरे लाल ही लाल।
दो आने में दे रहा, क्यों पड़ती है डांट।।
देख कदम के पेड़ पर, चिड़ियों की चहकार।
दौड़े-दौड़े आ गये, सभी एक ही घाट।।
नाहर दिल को भा रहे, तुतलाते यह बोल।
ज़हर कभी ना घोलना, कल बैठें इक खाट।।
बाल सजल- ३
खेल-खेल में सीखते, हो पक्की बुनियाद।
सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ें, सदा रहें आबाद।।
बच्चों की अठखेलियां, करती भावविभोर।
पलभर में रूठें मनें, रुकें नहीं संवाद।।
छोटे बच्चे लाड़ले, करते सबको प्यार।
महक सदा देते रहें, बचपन है आजाद।।
छोटी-छोटी उंगलियां, छोटे-छोटे पांव।
सरपट दौड़े आ रहे, फिर करते हैं वाद।।
बच्चों की टोली चली, अलगोजों के साथ।
नाचें गाएं घूमते, मन को भाते नाद।।
मीठी-मीठी बोलियां, घर आंगन के द्वार।
आ जाते हैं खेलने, हम को सब पर माद।।
नाहर कहें बच्चे सदा, करते दिल की बात।
पल-पल हर पल सीखते, समय न हो बर्बाद।।
बाल सजल- ४
बुलबुल चुलबुल कर रहे, है बच्चों से प्यार।
निकल नीड़ से आ गये, यह इनका संसार।।
बच्चों की टोली बनी, खड़े पेड़ की छांव।
हरियल तोता साथ में, है इनका परिवार।।
खग देखे आकाश में, करते बड़े कमाल।
क्या छीना है बाज़ का, होते रोज शिकार।।
बाल हाथ ले झुंझुना, चला मात के संग।
अंग-अंग बौरारहा, देखी मस्त बहार।।
छोड़ उंगली चल दिया, आ पहुंचा मैदान।
सर्दी से बचकर रहो, ठंडी चलें बयार।।
गिल्ली-डंडा खेलते, चलते मेंढक चाल।
नदी किनारे आ खड़े, टूट गया पतवार।।
मिलजुल बच्चे खेलते, नहीं धर्म की बात।
कह नाहर सब एक हैं, देते महक अपार।।
बाल सजल- ५
मात-पिता के बीच में, बंद हुआ संवाद।
रोज-रोज हर बात पर,करते वाद-विवाद।।
समय कभी देते नहीं, सुनें न कोई बात।
खेत उजड़ने लग रहा, मिले न उर्वर खाद।।
बच्चे पूछें मात से, जाना उनका हाल।
फूट-फूट रोने लगी,कल डाला है वाद।।
लड़का सुन मुर्छित हुआ,यह कैसा व्यवहार।
हम डांटेंगे तात को, कौन सुने फरियाद।।
घर में बालिग बहिन है, माता है लाचार।
करे चाकरी गांव में, हुए बहुत बर्बाद।।
दिन ढलते फिर चल दिये, मधुशाला की ओर।
रोक न पाओगे कभी, पंछी है आजाद।।
नाहर बुद्ध के सार पर,करना तनिक विचार।
जो खोया वह भूलकर, शुरू करो संवाद।।
(कवि-परिचय)
रघुबीर सिंह ‘नाहर’
रघुबीर सिंह ‘नाहर’ हिंदी के समकालीन सजल-कवि हैं, जिन्होंने नवीन काव्य-विधाओं में सृजनात्मक प्रयोग कर साहित्य को समृद्ध किया है। वे हिंदी में बाल-सजल विधा के प्रथम रचनाकार के रूप में विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनकी रचनाएँ बाल-मन की सहजता, ग्राम्य संस्कृति और सामाजिक यथार्थ—तीनों को संतुलित रूप में अभिव्यक्त करती हैं।
पेशे से अधिवक्ता होते हुए भी नाहर का साहित्यिक सरोकार मानवीय संवेदना, सामाजिक संवाद और नैतिक मूल्यों से गहराई से जुड़ा हुआ है। उनकी कविताओं में बचपन केवल स्मृति नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का आधार बनकर उभरता है। यही कारण है कि उनके बाल-सजल मनोरंजन के साथ-साथ विचार और संवेदना का विस्तार भी करते हैं।
रघुबीर सिंह ‘नाहर’ की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और लोक-संस्कृति से संपृक्त है। वे काव्य को अलंकरण नहीं, बल्कि अनुभव की सच्ची अभिव्यक्ति मानते हैं। सजल-विधा में उनका योगदान इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि उन्होंने इसे बाल-साहित्य के क्षेत्र में स्थापित कर एक नई परंपरा का सूत्रपात किया।
पता / संपर्क
नाहर भवन, 8A शास्त्री नगर
एडवोकेट मार्ग, अलवर (राजस्थान) – 301001
मोबाइल : 9413058580
निष्कर्ष
बाल-सजल केवल बच्चों के लिए लिखी गई कविता नहीं है, बल्कि बचपन को समझने की एक काव्यात्मक दृष्टि है। रघुवीर सिंह ‘नाहर’ ने इसे संवेदना, शिल्प और सामाजिक चेतना—तीनों स्तरों पर सार्थक बनाया है। हिंदी बाल-साहित्य और सजल-विधा के इतिहास में यह रचनाएँ प्रारंभिक और मार्गदर्शक दस्तावेज़ के रूप में देखी जाएँगी।
✍️ लेखक - देवचंद्र भारती 'प्रखर'
(आंबेडकरवादी साहित्यकार एवं चिंतक)
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