संदेश

संतशिरोमणि गुरु रविदास की प्रामाणिक जीवनी

संत रैदास अथवा रविदास एवं किंचित उच्चारण भेद के साथ इसी से मिलने वाले अनेक नाम देश के विभिन्न भागों में प्रचलित मिलते हैं । सर्वप्रथम इस विषय में निर्णय की आवश्यकता है कि यह एक ही संत के विभिन्न नाम हैं या एक से अधिक संतों का व्यक्तित्व एक ही व्यक्ति पर आरोपित हो गया है ।  इस संबंध में मिलने वाले विभिन्न नाम हैं - रविदास, रैदास, रायदाय, रूद्रदास, रुईदास, रयिदास, रोहीदास, रोहितास, रुहदास, रमादास, रामदास, हरिदास ।  इनमें से रविदास तथा रैदास दो नाम तो ऐसे नाम हैं जो दोनों ही संत रैदास की रचनाओं में उपलब्ध होते हैं । शेष नाम उनकी रचनाओं में कहीं नहीं मिलते । वे सभी नाम विभिन्न अन्य लेखों या अन्य व्यक्तियों के द्वारा उनके लिए प्रयोग किए गए  हैं । गुरु ग्रंथ साहिब में रविदास नाम से 40 पद तथा एक श्लोक संकलित है । इस रचनाकार के विषय में काशी का निवासी तथा जात से चमार होने का वर्णन मिलता है । किंतु साथ ही ग्रंथ साहिब में ही अन्य स्थलों पर ऐसे भी पद मिलते हैं, जिनमें काशी के निवासी चमार रैदास का प्रसंग मिलता है । इससे हम इस निर्णय पर सफलतापूर्वक पहुंच सकते हैं कि ग्रंथ साहिब के र...

अरी वरुणा की शांत कछार - जयशंकर प्रसाद

छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कविता 'अरी वरुणा की शांत कछार !' तथागत गौतम बुद्ध को समर्पित है । वह कविता अवलोकन हेतु प्रस्तुत है । अरी, वरुणा की शांत कछार !  (बुद्ध को समर्पित कविता) Aree, Varuna Ki Shant Kachhar / Jayshankar Prasad  अरी वरुणा की शांत कछार ! तपस्वी के विराग की प्यार ! सतत  व्याकुलता के विश्राम,  अरे ऋषियों के कानन-कुंज ! जगत नश्वरता से लघु प्राण,  लता, पादप, सुमनों के पुंज ! तुम्हारी कुटियों में चुपचाप,  चल रहा था उज्जवल व्यापार । स्वर्ग की वसुधा से शुचि संधि,  गूंजता था जिससे संसार । अरी वरुणा की शांत कछार ! तपस्वी के विराग की प्यार ! तुम्हारे  कुंजों में तल्लीन,  दर्शनों के होते थे वाद । देवताओं के प्रादुर्भाव,  स्वर्ग के सपनों के संवाद । स्निग्ध तरु की छाया में बैठ,  परिषदें करती थीं सुविचार । भाग कितना लेगा मस्तिष्क,  हृदय का कितना है अधिकार ? अरी वरुणा की शांत कछार ! तपस्वी के विराग की प्यार ! छोड़कर  पार्थिव भोग विभूति,  प्रेयसी का दुर्लभ वह प्यार । पिता का वचन भरा वात्सल्य,  पुत...

दलित जागरण (कविता संग्रह)

समर्पण  -  दलित समाज को समता और स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करने वाले, आधुनिक भारत के निर्माता बाबा साहेब डॉ० भीमराव अंबेडकर जी को समर्पित । अभिमत -  दोहा, चौपाई तथा छोटी-छोटी तुकबंदियों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि यदि थोड़ा सा भी ध्यान देकर सुना या पढ़ा जाए, तो ये क्षण-मात्र में बड़ी सरलता से कंठस्थ हो जाते हैं । मनोरंजक खेल अंत्याक्षरी में तो ये बड़े काम के होते हैं । साहित्य की यह विधा यत्र - तत्र बिखरी पड़ी है । प्राचीन काल, मध्यकाल, आधुनिक काल के कवियों और महापुरुषों की रचनाएँ, इस विधा में समाज को मिलती रही हैं । इसका अभाव वर्तमान में दिख रहा है । संत समाज में यह विधा वाणी के रूप में है और अध्यात्म जगत के लिए यह अमृत रस है । सामान्य जीवन में क्षण - प्रतिक्षण उद्घाटित होने वाले शब्द क्षणगेयता की छोटी-छोटी पंक्तियों में बंधकर रचना का रूप धारण कर लेते हैं । देवचंद्र भारती 'प्रखर' ने संसाधन विहीन ग्रामीण परिवेश में रहते हुए जो अनुभूति की, उसे ही कलमबद्ध भी किया । स्थानीय बोली में शब्दों का प्रयोग बड़ी ही पटुता के साथ किया है, जिसका पुट इनके दोहों और छंदों में ...

नागपंचमी का सच : क्या यह वास्तव में एक बौद्ध पर्व है?

भारत में नागपंचमी को सामान्यतः एक हिंदू पर्व के रूप में जाना जाता है। इस अवसर पर नागों की पूजा, उन्हें दूध अर्पित करने तथा उनसे जुड़ी अनेक पौराणिक कथाओं का प्रचार किया जाता है। किंतु एक वैकल्पिक ऐतिहासिक दृष्टिकोण यह मानता है कि नागपंचमी का मूल संबंध नागवंशी शासकों और बौद्ध परंपरा से है, न कि सर्प-पूजा से। इस लेख में नागपंचमी के ऐतिहासिक, भौगोलिक और वैज्ञानिक पक्षों पर विचार किया गया है।    नागपंचमी का अर्थ  'नागपंचमी' शब्द दो शब्दों 'नाग' और 'पंचमी' से मिलकर बना है। इसके दो प्रमुख अर्थ माने जाते हैं—  1. नागों की पंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी का दिन)।  2. पाँच नागों का समूह।  हिंदी में 'नाग' शब्द केवल साँप का ही पर्याय नहीं है। इसका प्रयोग राजा, हाथी, पर्वत तथा नागवंशी समुदाय के अर्थ में भी मिलता है। लोकप्रचलित मान्यता पहले अर्थ पर आधारित है, जबकि दूसरे अर्थ के आधार पर कुछ इतिहासकार इसे पाँच नागवंशी शासकों की स्मृति से जोड़ते हैं।  नागपंचमी का ऐतिहासिक पक्ष  एक मत के अनुसार नागपंचमी उन पाँच प्रमुख नागवंशी राजाओं की स्मृति में मनाई जाती थी, जिन्होंन...