रामचरितमानस : एक ईमानदार साहित्यिक आलोचक की दृष्टि में
भारतीय साहित्य की परंपरा में कुछ ग्रंथ ऐसे हैं जो केवल “पुस्तक” नहीं रहते — वे समाज की चेतना का हिस्सा बन जाते हैं। रामचरितमानस ऐसा ही ग्रंथ है। इसे पढ़ना केवल काव्य पढ़ना नहीं, एक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संरचना से संवाद करना है। लेकिन प्रश्न यह है: क्या हम इसे केवल श्रद्धा से पढ़ेंगे, या आलोचनात्मक विवेक से भी? 1. काव्य-शक्ति: भाषा, लय और लोक-संवेदना सबसे पहले न्याय यही है कि इसकी काव्यात्मक उपलब्धि को स्वीकार किया जाए। तुलसीदास ने अवधी को जिस ऊँचाई पर पहुँचाया, वह अद्वितीय है। छंदों की प्रवाहशीलता, अलंकारों की सहजता और कथानक की क्रमबद्धता इसे अत्यंत प्रभावशाली बनाती है। यह ग्रंथ केवल पढ़ा नहीं जाता — गाया जाता है, स्मरण किया जाता है, जीया जाता है। यह उसकी सौंदर्य-शक्ति है। 2. आदर्श नायक की रचना — शक्ति या सीमा? मानस में राम एक आदर्श पुरुष हैं — मर्यादा, करुणा और धर्म के प्रतीक। लेकिन आधुनिक साहित्यिक दृष्टि पूछती है: क्या यह आदर्शीकरण पात्र को मनुष्य से देवत्व की ओर इतना उठा देता है कि उसकी मानवीय जटिलता धुँधली हो जाती है? यदि हम इसकी तुलना महाभारत से करें, वहाँ पात्र अधिक द्वंद्वग्रस्त ...